भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1128, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1128

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एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

तपस्वी श्रीकृष्णके पास ऋषियोंका आना, उनका प्रभाव देखना और उनसे वार्तालाप करना

युधिष्ठिर उवाच

पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
आगमैर्बहुभिः स्फीतो भवान् नः प्रवरे कुले ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— महाप्राज्ञ पितामह! आप हमारे श्रेष्ठ कुलमें सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशिष्ट विद्वान् और अनेक आगमोंके ज्ञानसे सम्पन्न हैं ॥ १ ॥

त्वत्तो धर्मार्थसंयुक्तमायत्यां च सुखोदयम् ।
आश्चर्यभूतं लोकस्य श्रोतुमिच्छाम्यरंदम ॥ २ ॥
शत्रुदमन! मैं आपके मुखसे अब ऐसे विषयका वर्णन सुनना चाहता हूँ, जो धर्म और अर्थसे युक्त, भविष्यमें सुख देनेवाला और संसारके लिये अद्भुत हो ॥ २ ॥

अयं च कालः सम्प्राप्तो दुर्लभो ज्ञातिबान्धवैः ।
शास्ता च न हि नः कश्चित् त्वामृते पुरुषर्षभ ॥ ३ ॥
पुरुषप्रवर! हमारे बन्धु-बान्धवोंको यह दुर्लभ अवसर प्राप्त हुआ है। हमारे लिये आपके सिवा दूसरा कोई समस्त धर्मोंका उपदेश करनेवाला नहीं है ॥ ३ ॥

यदि तेऽहमनुग्राह्यो भ्रातृभिः सहितोऽनघ ।
वक्तुमर्हसि नः प्रश्नं यत् त्वां पृच्छामि पार्थिव ॥ ४ ॥
अनघ! यदि भाइयोंसहित मुझपर आपका अनुग्रह हो तो पृथ्वीनाथ! मैं आपसे जो प्रश्न पूछता हूँ, उसका हम सब लोगोंके लिये उत्तर दीजिये ॥ ४ ॥

अयं नारायणः श्रीमान् सर्वपार्थिवसम्मतः ।
भवन्तं बहुमानेन प्रश्रयेण च सेवते ॥ ५ ॥
सम्पूर्ण नरेशोंद्वारा सम्मानित ये श्रीमान् भगवान् नारायण श्रीकृष्ण बड़े आदर और विनयके साथ आपकी सेवा करते हैं ॥ ५ ॥

अस्य चैव समक्षं त्वं पार्थिवानां च सर्वशः ।
भ्रातॄणां च प्रियार्थं मे स्नेहाद् भाषितुमर्हसि ॥ ६ ॥
इनके तथा इन भूपतियोंके सामने मेरा और मेरे भाइयोंका सब प्रकारसे प्रिय करनेके लिये इस पूछे हुए विषयका सस्नेह वर्णन कीजिये ॥ ६ ॥