भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1132, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1132

‘महर्षियो! ऋषिसमुदाय तो आसक्ति और ममतासे रहित है! सबको शास्त्रोंका ज्ञान है, फिर भी आपलोगोंको आश्चर्य क्यों हो रहा है? ॥ २४ ॥ एतन्मे संशयं सर्वे याथातथ्यमनिन्दिताः । ऋषयो वक्तुमर्हन्ति निश्चितार्थं तपोधनाः ॥ २५ ॥ ‘तपोधन ऋषियो! आप सब लोग सबके द्वारा प्रशंसित हैं, अतः मेरे इस संशयको निश्चित एवं यथार्थ-रूपसे बतानेकी कृपा करें’ ॥ २५ ॥

ऋषय ऊचुः भवान् विसृजते लोकान् भवान् संहरते पुनः । भवान् शीतं भवानुष्णं भवानेव च वर्षति ॥ २६ ॥ **ऋषियोंने कहा—**भगवान्! आप ही संसारको बनाते और आप ही पुनः उसका संहार करते हैं। आप ही सर्दी, आप ही गर्मी और आप ही वर्षा करते हैं ॥ २६ ॥ पृथिव्यां यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च । तेषां पिता त्वं माता त्वं प्रभुः प्रभव एव च ॥ २७ ॥ इस पृथ्वीपर जो भी चराचर प्राणी हैं, उनके पिता-माता, प्रभु और उत्पत्तिस्थान भी आप ही हैं ॥ एवं नो विस्मयकरं संशयं मधुसूदन । त्वमेवार्हसि कल्याण वक्तुं वह्नेर्विनिर्गमम् ॥ २८ ॥ मधुसूदन! आपके मुखसे अग्निका प्रादुर्भाव हमारे लिये इस प्रकार विस्मयजनक हुआ है। हम संशयमें पड़ गये हैं। कल्याणमय श्रीकृष्ण! आप ही इसका कारण बताकर हमारे संदेह और विस्मयका निवारण कर सकते हैं ॥ २८ ॥ ततो विगतसंत्रासा वयमप्यरिकर्शन । यच्छ्रुतं यच्च दृष्टं नस्तत् प्रवक्ष्यामहे हरे ॥ २९ ॥ शत्रुसूदन हरे! उसे सुनकर हम भी निर्भय हो जायँगे और हमने जो आश्चर्यकी बात देखी या सुनी है, उसका हम आपके सामने वर्णन करेंगे ॥ २९ ॥

वासुदेव उवाच एतद् वै वैष्णवं तेजो मम वक्त्राद् विनिःसृतम् । कृष्णवर्त्मा युगान्ताभो येनायं मथितो गिरिः ॥ ३० ॥ **श्रीकृष्ण बोले—**मुनिवरो! मेरे मुखसे यह मेरा वैष्णव तेज प्रकट हुआ था; जिसने प्रलयकालकी अग्निके समान रूप धारण करके इस पर्वतको दग्ध कर डाला था ॥ ३० ॥ ऋषयश्चार्तिमापन्ना जितक्रोधा जितेन्द्रियाः । भवन्तो व्यथिताश्चासन् देवकल्पास्तपोधनाः ॥ ३१ ॥