महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1134, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंआश्चर्यं परमं किंचित् तद् भवन्तो ब्रुवन्तु मे ॥ ३९ ॥ इसलिये मेरी प्रार्थना है कि यदि आपलोगोंने इस पृथ्वीपर या स्वर्गमें कोई महान् आश्चर्यकी बात देखी या सुनी हो तो उसको मुझे बतलाइये ॥ ३९ ॥ तस्यामृतनिकाशस्य वाङ्मधोरस्ति मे स्पृहा । भवद्भिः कथितस्येह तपोवननिवासिभिः ॥ ४० ॥ आपलोग तपोवनमें निवास करनेवाले हैं, इस जगत्में आपके द्वारा कथित अमृतके समान मधुर वचन सुननेकी इच्छा मुझे सदा बनी रहती है ॥ ४० ॥ यद्यप्यहमदृष्टं वो दिव्यमद्भुतदर्शनम् । दिवि वा भुवि वा किंचित् पश्याम्यमरदर्शनाः ॥ ४१ ॥ प्रकृतिः सा मम परा न क्वचित् प्रतिहन्यते । न चात्मगतमैश्वर्यमाश्चर्यं प्रतिभाति मे ॥ ४२ ॥ श्रद्धेयः कथितो ह्यर्थः सज्जनश्रवणं गतः । चिरं तिष्ठति मेदिन्यां शैले लेख्यामिवार्पितम् ॥ ४३ ॥ महर्षियो! आपका दर्शन देवताओंके समान दिव्य है। यद्यपि द्युलोक अथवा पृथिवीमें जो दिव्य एवं अद्भुत दिखायी देनेवाली वस्तु है, जिसे आपलोगोंने भी नहीं देखा है, वह सब मैं प्रत्यक्ष देखता हूँ। सर्वज्ञता मेरा उत्तम स्वभाव है। वह कहीं भी प्रतिहत नहीं होता तथा मुझमें जो ऐश्वर्य है, वह मुझे आश्चर्यरूप नहीं जान पड़ता तथापि सत्पुरुषोंके कानोंमें पड़ा हुआ कथित विषय विश्वासके योग्य होता है और वह पत्थरपर खिंची हुई लकीरकी भाँति इस पृथ्वीपर बहुत दिनोंतक कायम रहता है ॥ ४१—४३ ॥ तदहं सज्जनमुखान्निःसृतं तत्समागमे । कथयिष्याम्यहमहो बुद्धिदीपकं नृणाम् ॥ ४४ ॥ अतः मैं आप साधु-संतोंके मुखसे निकले हुए वचनको मनुष्योंकी बुद्धिका उद्दीपक (प्रकाशक) मानकर उसे सत्पुरुषोंके समाजमें कहूँगा ॥ ४४ ॥ ततो मुनिगणाः सर्वे विस्मिताः कृष्णसंनिधौ । नेत्रैः पद्मदलप्रख्यैरपश्यंस्त जनार्दनम् ॥ ४५ ॥ यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्णके समीप बैठे हुए सभी ऋषियोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे कमलदलके समान खिले हुए नेत्रोंसे उनकी ओर देखने लगे ॥ ४५ ॥ वर्धयन्तस्तथैवान्ये पूजयन्तस्तथापरे । वाग्भिर्ऋग्भूषितार्थाभिः स्तुवन्तो मधुसूदनम् ॥ ४६ ॥ कोई उन्हें बधाई देने लगा, कोई उनकी पूजा-प्रशंसा करने लगा और कोई ऋग्वेदकी अर्थयुक्त ऋचाओंद्धारा उन मधुसूदनकी स्तुति करने लगा ॥ ४६ ॥ ततो मुनिगणाः सर्वे नारदं देवदर्शनम् । तदा नियोजयामासुर्वचने वाक्यकोविदम् ॥ ४७ ॥