भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1143, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1143

देवि! अनिन्दिते! तुमने अपने भोलेपनके कारण मेरी दोनों आँखें बंद कर दीं। इससे

क्षणभरमें समस्त संसारका प्रकाश तत्काल नष्ट हो गया ॥ ४३ ॥

नष्टादित्ये तथा लोके तमोभूते नगात्मजे ।

तृतीयं लोचनं दीप्तं सृष्टं मे रक्षता प्रजाः ॥ ४४ ॥

गिरिराजकुमारी! संसारमें जब सूर्य अदृश्य हो गये और सब ओर अन्धकार-ही-

अन्धकार छा गया, तब मैंने प्रजाकी रक्षाके लिये अपने तीसरे तेजस्वी नेत्रकी सृष्टि की

है ॥ ४४ ॥

तस्य चाक्ष्णो महत् तेजो येनायं मथितो गिरिः ।

त्वत्प्रियार्थं च मे देवि प्रकृतिस्थः पुनः कृतः ॥ ४५ ॥

उसी तीसरे नेत्रका यह महान् तेज था, जिसने इस पर्वतको मथ डाला। देवि! फिर

तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मैंने इस गिरिराज हिमवान्को पुनः प्रकृतिस्थ कर दिया

है ॥ ४५ ॥

उमोवाच

भगवन् केन ते वक्त्रं चन्द्रवत् प्रियदर्शनम् ।

पूर्वं तथैव श्रीकान्तमुत्तरं पश्चिमं तथा ॥ ४६ ॥

दक्षिणं च मुखं रौद्रं केनोर्ध्वं कपिला जटाः ।

केन कण्ठश्च ते नीलो बर्हिबर्हनिभः कृतः ॥ ४७ ॥

उमाने कहा—भगवन्! (आपके चार मुख क्यों हैं।) आपका पूर्व दिशावाला मुख

चन्द्रमाके समान कान्तिमान् एवं देखनेमें अत्यन्त प्रिय है। उत्तर और पश्चिम दिशाके मुख

भी पूर्वकी ही भाँति कमनीय कान्तिसे युक्त हैं। परंतु दक्षिण दिशावाला मुख बड़ा भयंकर

है। यह अन्तर क्यों? तथा आपके सिरपर कपिल वर्णकी जटाएँ कैसे हुईं? क्या कारण है

कि आपका कण्ठ मोरकी पाँखके समान नीला हो गया? ॥ ४६-४७ ॥

हस्ते देव पिनाकं ते सततं केन तिष्ठति ।

जटिलो ब्रह्मचारी च किमर्थमसि नित्यदा ॥ ४८ ॥

देव! आपके हाथमें पिनाक क्यों सदा विद्यमान रहता है? आप किसलिये नित्य

जटाधारी ब्रह्मचारीके वेशमें रहते हैं? ॥ ४८ ॥

एतन्मे संशयं सर्वं वक्तुमर्हसि वै प्रभो ।

सधर्मचारिणी चाहं भक्ता चेति वृषध्वज ॥ ४९ ॥

प्रभो! वृषध्वज! मेरे इस सारे संशयका समाधान कीजिये; क्योंकि मैं आपकी

सहधर्मिणी और भक्त हूँ ॥ ४९ ॥

भीष्म उवाच

एवमुक्तः स भगवान् शैलपुत्र्या पिनाकधृत् ।