भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1155, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1155

परिचारक होते हैं। देवि! अब तुम एकाग्रचित्त होकर चारों वर्णोंके धर्म और कर्मोंका वर्णन

सुनो ।।

विप्राः कृता भूमिदेवा लोकानां धारणे कृताः ।

ते कैश्चिन्नावमन्तव्या ब्राह्मणा हितमिच्छुभिः ।।

ब्राह्मणको इस भूमिका देवता बनाया गया है। वे सब लोकोंकी रक्षाके लिये उत्पन्न

किये गये हैं। अतः अपने हितकी इच्छा रखनेवाले किसी भी मनुष्यको ब्राह्मणोंका अपमान

नहीं करना चाहिये ।।

यदि ते ब्राह्मणा न स्युर्दानयोगवहाः सदा ।

उभयोर्लोकयोर्देवि स्थितिर्न स्यात् समासतः ।।

देवि! यदि दान और योगका वहन करनेवाले वे ब्राह्मण न हों तो लोक और परलोक

दोनोंकी स्थिति कदापि नहीं रह सकती ।।

ब्राह्मणान् योऽवमन्येत निन्देच्च क्रोधयेच्च वा ।

प्रहरेत् हरेद् वापि धनं तेषां नराधमः ।।

कारयेद्दीनकर्माणि कामलोभविमोहनात् ।

स च मामवमन्येत मां क्रोधयति निन्दति ।।

मामेव प्रहरेन्मूढो मद्धनस्यापहारकः ।

मामेव प्रेषणं कृत्वा निन्दते मूढचेतनः ।।

जो ब्राह्मणोंका अपमान और निन्दा करता अथवा उन्हें क्रोध दिलाता या उनपर प्रहार

करता अथवा उनका धन हर लेता है या काम, लोभ एवं मोहके वशीभूत होकर उनसे नीच

कर्म कराता है, वह नराधम मेरा ही अपमान या निन्दा करता है। मुझे ही क्रोध दिलाता है,

मुझपर ही प्रहार करता है, वह मूढ़ मेरे ही धनका अपहरण करता है तथा वह मूढ़चित्त

मानव मुझे ही इधर-उधर भेजकर नीच कर्म कराता और निन्दा करता है ।।

स्वाध्यायो यजनं दानं तस्य धर्म इति स्थितिः ।

कर्माण्यध्यापनं चैव याजनं च प्रतिग्रहः ।।

सत्यं शान्तिस्तपः शौचं तस्य धर्मः सनातनः ।

वेदोंका स्वाध्याय, यज्ञ और दान ब्राह्मणका धर्म है, यह शास्त्रका निर्णय है। वेदोंको

पढ़ाना, यजमानका यज्ञ कराना और दान लेना—ये उसकी जीविकाके साधनभूत कर्म हैं।

सत्य, मनोनिग्रह, तप और शौचाचारका पालन—यह उनका सनातन धर्म है ।।

विक्रयो रसधान्यानां ब्राह्मणस्य विगर्हितः ।।

रस और धान्य (अनाज) का विक्रय करना ब्राह्मणके लिये निन्दित है ।।

तप एव सदा धर्मो ब्राह्मणस्य न संशयः ।

स तु धर्मार्थमुत्पन्नः पूर्वं धात्रा तपोबलात् ।।