भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1157, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1157

ब्रह्मचारीके लिये भैक्षचर्या (गाँवोंमेंसे भिक्षा माँगकर लाना और गुरुको समर्पित करना) परम धर्म है। नित्य यज्ञोपवीत धारण किये रहना, प्रतिदिन वेदका स्वाध्याय करना और ब्रह्मचर्याश्रमके नियमोंके पालनमें लगे रहना, ब्रह्मचारीका प्रधान कर्म है ॥ ३६ ॥ गुरुणा चाभ्यनुज्ञातः समावर्तेत वै द्विजः । विन्देतानन्तरं भार्यामनुरूपां यथाविधि ॥ ३७ ॥ ब्रह्मचर्यकी अवधि समाप्त होनेपर द्विज अपने गुरुकी आज्ञा लेकर समावर्तन करे और घर आकर अनुरूप स्त्रीसे विधिपूर्वक विवाह करे ॥ ३७ ॥ शूद्रान्नवर्जनं धर्मस्तथा सत्पथसेवनम् । धर्मो नित्योपवासित्वं ब्रह्मचर्यं तथैव च ॥ ३८ ॥ ब्राह्मणको शूद्रका अन्न नहीं खाना चाहिये, यह उसका धर्म है। सन्मार्गका सेवन, नित्य उपवास-व्रत और ब्रह्मचर्यका पालन भी धर्म है ॥ ३८ ॥ आहिताग्निरधीयानो जुह्वानः संयतेन्द्रियः । विघसाशी यताहारो गृहस्थः सत्यवाक् शुचिः ॥ ३९ ॥ गृहस्थको अग्निस्थापनपूर्वक अग्निहोत्र करनेवाला, स्वाध्यायशील, होमपरायण, जितेन्द्रिय, विघसाशी, मिताहारी, सत्यवादी और पवित्र होना चाहिये ॥ ३९ ॥ अतिथिव्रतता धर्मो धर्मस्त्रेताग्निधारणम् । इष्टींश्च पशुबन्धांश्च विधिपूर्वं समाचरेत् ॥ ४० ॥ अतिथि-सत्कार करना और गार्हपत्य आदि त्रिविध अग्नियोंकी रक्षा करना उसके लिये धर्म है। वह नाना प्रकारकी इष्टियों और पशुरक्षाकर्मका भी विधिपूर्वक आचरण करे ॥ ४० ॥ यज्ञश्च परमो धर्मस्तथाहिंसा च देहिषु । अपूर्वभोजनं धर्मो विघसाशित्वमेव च ॥ ४१ ॥ यज्ञ करना तथा किसी भी जीवकी हिंसा न करना उसके लिये परम धर्म है। घरमें पहले भोजन न करना तथा विघसाशी होना—कुटुम्बके लोगोंके भोजन करानेके बाद ही अवशिष्ट अन्नका भोजन करना—यह भी उसका धर्म है ॥ ४१ ॥ भुक्ते परिजने पश्चाद् भोजनं धर्म उच्यते । ब्राह्मणस्य गृहस्थस्य श्रोत्रियस्य विशेषतः ॥ ४२ ॥ जब कुटुम्बीजन भोजन कर लें उसके पश्चात् स्वयं भोजन करना—यह गृहस्थ ब्राह्मणका विशेषतः श्रोत्रियका मुख्य धर्म बताया गया है ॥ ४२ ॥ दम्पत्योः समशीलत्वं धर्मः स्याद् गृहमेधिनः । गृह्याणां चैव देवानां नित्यपुष्पबलिक्रिया ॥ ४३ ॥ नित्योपलेपनं धर्मस्तथा नित्योपवासिता ।