महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1200, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिनके सब प्रकारके संदेह दूर हो गये हैं, जो प्रलय और उत्पत्तिके तत्त्वको जाननेवाले, सर्वज्ञ और सर्वद्रष्टा हैं, वे महात्मा न तो धर्मसे बँधते हैं और न अधर्मसे ।। ६ ।। वीतरागा विमुच्यन्ते पुरुषाः कर्मबन्धनैः । कर्मणा मनसा वाचा ये न हिंसन्ति किंचन ।। ७ ।। जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसीकी हिंसा नहीं करते हैं और जिनकी आसक्ति सर्वथा दूर हो गयी है, वे पुरुष कर्मबन्धनोंसे मुक्ता हो जाते हैं ।। ७ ।। ये न सज्जन्ति कस्मिंश्चित् ते न बध्यन्ति कर्मभिः । प्राणातिपाताद् विरताः शीलवन्तो दयान्विताः ।। ८ ।। तुल्यद्वेष्यप्रिया दान्ता मुच्यन्ते कर्मबन्धनैः । जो कहीं आसक्त नहीं होते, किसीके प्राणोंकी हत्यासे दूर रहते हैं तथा जो सुशील और दयालु हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनोंमें नहीं पड़ते, जिनके लिये शत्रु और प्रिय मित्र दोनों समान हैं, वे जितेन्द्रिय पुरुष कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं ।। ८ १/२ ।। सर्वभूतदयावन्तो विश्वास्याः सर्वजन्तुषु ।। ९ ।। त्यक्तहिंसासमाचारास्ते नराः स्वर्गगामिनः । जो सब प्राणियोंपर दया करनेवाले, सब जीवोंके विश्वासपात्र तथा हिंसामय आचरणोंको त्याग देनेवाले हैं, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ।। ९ १/२ ।। परस्वे निर्ममा नित्यं परदारविवर्जकाः ।। १० ।। धर्मलब्धान्नभोक्तारस्ते नराः स्वर्गगामिनः । जो दूसरोंके धनपर ममता नहीं रखते, परायी स्त्रीसे सदा दूर रहते और धर्मके द्वारा प्राप्त किये अन्नका ही भोजन करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। १० १/२ ।। मातृवत् स्वसृवच्चैव नित्यं दुहितृवच्च ये ।। ११ ।। परदारेषु वर्तन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः । जो मानव परायी स्त्रीको माता, बहिन और पुत्रीके समान समझकर तदनुरूप बर्ताव करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। ११ १/२ ।। स्तैन्यान्निवृत्ताः सततं संतुष्टाः स्वधनेन च ।। १२ ।। स्वभाग्यान्युपजीवन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः । जो सदा अपने ही धनसे संतुष्ट रहकर चोरी-चमारीसे अलग रहते हैं तथा जो अपने भाग्यपर ही भरोसा रखकर जीवन-निर्वाह करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। १२ १/२ ।। स्वदारनिरता ये च ऋतुकालाभिगामिनः ।। १३ ।। अग्राम्यसुखभोगाश्च ते नराः स्वर्गगामिनः । जो अपनी ही स्त्रीमें अनुरक्त रहकर ऋतुकालमें ही उसके साथ समागम करते हैं और ग्राम्य सुख-भोगोंमें आसक्त नहीं होते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। १३ १/२ ।।