भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1203, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1203

श्रीमहेश्वर उवाच

मानसेनेह धर्मेण संयुक्ताः पुरुषाः सदा । स्वर्गं गच्छन्ति कल्याणि तन्मे कीर्तयतः शृणु ॥ २९ ॥ श्रीमहेश्वरने कहा— कल्याणि! जो सदा मानसिक धर्मसे युक्त हैं अर्थात् मनसे धर्मका ही चिन्तन और आचरण करते हैं, वे पुरुष स्वर्गमें जाते हैं। मैं इस विषयमें जो बताता हूँ, उसे सुनो ॥ २९ ॥

दुष्प्रणीतेन मनसा दुष्प्रणीततरा कृतिः । मनो बध्यति येनेह शृणु वाक्यं शुभानने ॥ ३० ॥ शुभानने! मनमें दुर्विचार आनेसे मनुष्यके कार्य भी दुर्नीतिपूर्ण एवं दूषित होते हैं, जिससे मन बन्धनमें पड़ जाता है। इस विषयमें मेरी बात सुनो ॥ ३० ॥

अरण्ये विजने न्यस्तं परस्वं दृश्यते यदा । मनसापि न हिंसन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३१ ॥ जब दूसरेका धन निर्जन वनमें पड़ा हुआ दिखायी दे, उस समय भी जो उसकी ओर मन ललचाकर किसीकी हिंसा नहीं करते, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ॥

ग्रामे गृहे वा ये द्रव्यं पारक्यं विजने स्थितम् । नाभिनन्दन्ति वै नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३२ ॥ गाँव या घरके एकान्त स्थानमें पड़े हुए पराये धनका जो कभी अभिनन्दन नहीं करते हैं, वे मानव स्वर्गगामी होते हैं ॥ ३२ ॥

तथैव परदारान् ये कामवृत्तान् रहोगतान् । मनसापि न हिंसन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३३ ॥ इसी प्रकार जो मनुष्य एकान्तमें प्राप्त हुई कामासक्त परायी स्त्रियोंको मनसे भी उनके साथ अन्याय करनेका विचार नहीं करते, वे स्वर्गगामी होते हैं ॥ ३३ ॥

शत्रुं मित्रं च ये नित्यं तुल्येन मनसा नराः । भजन्ति मैत्राः संगम्य ते नसः स्वर्गगामिनः ॥ ३४ ॥ जो सबके प्रति मैत्रीभाव रखकर सबसे मिलते तथा शत्रु और मित्रको भी सदा समान हृदयसे अपनाते हैं, वे मानव स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ३४ ॥

श्रुतवन्तो दयावन्तः शुचयः सत्यसंगराः । स्वैरर्थैः परिसंतुष्टास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३५ ॥ जो शास्त्रज्ञ, दयालु पवित्र, सत्यप्रतिज्ञ और अपने ही धनसे संतुष्ट होते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ३५ ॥

अवैरा ये त्वनायासा मैत्रीचित्तरताः सदा । सर्वभूतदयावन्तस्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३६ ॥