भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1218, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1218

तन्मे शृणु वरारोहे तस्य पथ्यं जगद्धितम् ॥ तभीसे राजाओंका शुभाशुभ बर्ताव देखनेमें आया है। वरारोहे! राजाका जो आचरण जगत्‌के लिये हितकर और लाभदायक है, वह मुझसे सुनो ॥ यथा प्रेत्य लभेत् स्वर्गं यथा वीर्यं यशस्तथा । पित्र्यं वा भूतपूर्वं वा स्वयमुत्पाद्य वा पुनः ॥ राज्यधर्ममनुष्ठाय विधिवद् भोक्तुमर्हति ॥ जिस बर्तावके कारण वह मृत्युके पश्चात् स्वर्गका भागी हो सकता है, वही बता रहा हूँ। उसमें जैसा पराक्रम और जैसा यश होना चाहिये, वह भी सुनो। पिताकी ओरसे प्राप्त हुए अथवा और पहलेसे चले आते हुए अथवा स्वयं ही पराक्रमद्वारा प्राप्त करके वशमें किये हुए राज्यको राजा धर्मका आश्रय ले विधिपूर्वक उपभोगमें लाये ॥ आत्मानमेव प्रथमं विनयैरुपपादयेत् । अनुभृत्यान् प्रजाः पश्चादित्येष विनयक्रमः ॥ पहले अपने आपको ही विनयसे सम्पन्न करे। तत्पश्चात् सेवकों और प्रजाओंको विनयकी शिक्षा दे। यही विनयका क्रम है ॥ स्वामिनं चोपमां कृत्वा प्रजास्तद्वृत्तकाङ्क्षया । स्वयं विनयसम्पन्ना भवन्तीह शुभेक्षणे ॥ शुभेक्षणे! राजाको ही आदर्श मानकर उसके आचरण सीखनेकी इच्छासे प्रजावर्गके लोग स्वयं भी विनयसे सम्पन्न होते हैं ॥ स्वस्मात् पूर्वतरं राजा विनयत्येव वै प्रजाः । अपहास्यो भवेत्तादृक् स्वदोषस्यानवेक्षणात् ॥ जो राजा स्वयं विनय सीखनेके पहले प्रजाको ही विनय सिखाता है, वह अपने दोषोंपर दृष्टि न डालनेके कारण उपहासका पात्र होता है ॥ विद्याभ्यासैर्वृद्धयोगैरात्मानं विनयं नयेत् । विद्या धर्मार्थफलिनी तद्विदो वृद्धसंज्ञिताः ॥ विद्याके अभ्यास और वृद्ध पुरुषोंके संगसे अपने आपको विनयशील बनाये। विद्या धर्म और अर्थरूप फल देनेवाली है। जो उस विद्याके ज्ञाता हैं, उन्हींको वृद्ध कहते हैं ॥ इन्द्रियाणां जयो देवि अत ऊर्ध्वमुदाहृतः । अजये सुमहान् दोषो राजानं विनिपातयेत् ॥ देवि! इसके बाद राजाको अपनी इन्द्रियोंपर विजय पाना चाहिये—यह बात बतायी गयी। इन्द्रियोंको काबूमें न रखनेसे जो महान् दोष प्राप्त होता है, वह राजाको नीचे गिरा देता है ॥ पञ्चैव स्ववशे कृत्वा तदर्थान् पञ्च शोषयेत् । षडुत्सृज्य यथायोगं ज्ञानेन विनयेन च ॥