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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1226, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1226

गतिको जानकर उत्साहपूर्वक जूझता है, वह स्वर्गलोकमें जाता है ।।

यस्तु स्वं नायकं रक्षेद्तिघोरे रणाङ्गणे ।

तापयन्नरिसैन्यानि सिंहो मृगगणानिव ।।

आदित्य इव मध्याह्ने दुर्निरीक्ष्यो रणाजिरे ।।

निर्दयो यस्तु संग्रामे प्रहरन्तुद्यतायुधः ।

यजते स तु पूतात्मा संग्रामेण महाक्रतुम् ।।

जो अत्यन्त घोर समरांगणमें मृगोंके झुडोंको संतप्त करनेवाले सिंहके समान

शत्रुसैनिकोंको ताप देता हुआ अपने नायक (राजा या सेनापति) की रक्षा करता है,

मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति रणक्षेत्रमें जिसकी ओर देखना शत्रुओंके लिये अत्यन्त कठिन

हो जाता है तथा जो संग्राममें शस्त्र उठाये निर्दयतापूर्वक प्रहार करता है, वह शुद्धचित्त

होकर उस युद्धके द्वारा ही मानो महान् यज्ञका अनुष्ठान करता है ।।

वर्म कृष्णाजिनं तस्य दन्तकाष्ठं धनुः स्मृतम् ।

रथो वेदिर्ध्वजो यूपः कुशाश्च रथरश्मयः ।।

मानो दर्पस्त्वहङ्कारस्त्रयस्त्रेताग्नयः स्मृताः ।

प्रतोदश्च स्रुवस्तस्य उपाध्यायो हि सारथिः ।।

स्रुग्भाण्डं चापि यत् किंचिद् यज्ञोपकरणानि च ।।

आयुधान्यस्य तत् सर्वं समिधः सायकाः स्मृताः ।।

उस समय कवच ही उसका काला मृगचर्म है, धनुष ही दाँतुन या दन्तकाष्ठ है, रथ ही

वेदी है, ध्वज यूप है और रथकी रस्सियाँ ही बिछे हुए कुशोंका काम देती हैं। मान, दर्प और

अहंकार—ये त्रिविध अग्नियाँ हैं, चाबुक, सुवा है, सारथि उपाध्याय है, स्रुक्-भाण्ड आदि

जो कुछ भी यज्ञकी सामग्री है, उसके स्थानमें उस योद्धाके भिन्न-भिन्न अस्त्र-शस्त्र हैं।

सायकोंको ही समिधा माना गया है ।।

स्वेदस्रवश्च गात्रेभ्यः क्षौद्रं तस्य यशस्विनः ।

पुरोडाशा नृशीर्षाणि रुधिरं चाहुतिः स्मृता ।।

तूणाश्चैव चरुर्ज्ञेया वसोर्धारा वसाः स्मृताः ।।

क्रव्यादा भूतसंघाश्च तस्मिन् यज्ञे द्विजातयः ।

तेषां भक्तान्नपानानि हता नृगजवाजिनः ।।

उस यशस्वी वीरके अंगोंसे जो पसीने ढलते हैं, वे ही मानो मधु हैं। मनुष्योंके मस्तक

पुरोडाश हैं, रुधिर आहुति है, तूणीरोंको चरु समझना चाहिये। वसाको ही वसुधारा माना

गया है, मांसभक्षी भूतोंके समुदाय ही उस यज्ञमें द्विज हैं। मारे गये मनुष्य, हाथी और घोड़े

ही उनके भोजन और अन्नपान हैं ।।

निहतानां तु योधानां वस्त्राभरणभूषणम् ।

हिरण्यं च सुवर्णं च यद् वै यज्ञस्य दक्षिणा ।।