भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1232, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1232

जो राजा इस प्रकार राष्ट्रके हितमें तत्पर हो प्रतिदिन ऐसा बर्ताव करता है, उसके राष्ट्र, धन, धर्म, यश और कीर्तिका विस्तार होता है ॥ न च पापैर्न चानर्थैर्युज्यते स नराधिपः ॥ षड्भागमुपयुञ्जन् यः प्रजा राजा न रक्षति ॥ स्वचक्रपरचक्राभ्यां धर्मैर्वा विक्रमेण वा । निरुद्योगो नृपो यश्च परराष्ट्रविघातने ॥ स्वराष्ट्रं निष्प्रतापस्य परचक्रेण हन्यते ॥ ऐसा राजा पाप और अनर्थका भागी नहीं होता। जो नरेश प्रजाकी आयके छठे भागका उपयोग तो करता है; परंतु धर्म या पराक्रमद्वारा स्वचक्र (अपनी मण्डलीके लोगों) तथा परचक्र (शत्रुमण्डलीके लोगों)-से प्रजाकी रक्षा नहीं करता एवं जो राजा दूसरेके राष्ट्रपर आक्रमण करनेके विषयमें सदा उद्योगहीन बना रहता है, उस प्रतापहीन राजाका राज्य शत्रुओंद्वारा नष्ट कर दिया जाता है ॥ यत् पापं परचक्रस्य परराष्ट्राभिघातने । तत् पापं सकलं राजा हतराष्ट्रः प्रपद्यते ॥ दूसरे चक्रके राजाके लिये दूसरेके राष्ट्रका विनाश करनेपर जो पाप लागू होता है, वह समूचा पाप उस राजाको भी प्राप्त होता है, जिसका राज्य उसीकी दुर्बलताके कारण शत्रुओंद्वारा नष्ट कर दिया जाता है ॥ मातुलं भागिनेयं वा मातरं श्वशुरं गुरुम् । पितरं वर्जयित्वैकं हन्याद् घातकमागतम् ॥ मामा, भानजा, माता, श्वशुर, गुरु तथा पिता—इनमेंसे प्रत्येकको छोड़कर यदि दूसरा कोई मनुष्य मारनेकी नीयतसे आ जाय तो उसे (आततायी समझकर) मार डालना चाहिये ॥ स्वस्य राष्ट्रस्य रक्षार्थं युध्यमानस्तु यो हतः । संग्रामे परचक्रेण श्रूयतां तस्य या गतिः ॥ जो राजा अपने राष्ट्रकी रक्षाके लिये युद्धमें जूझता हुआ शत्रुमण्डलके द्वारा मारा जाता है, उसे जो गति मिलती है, उसको श्रवण करो ॥ विमाने तु वरारोहे अप्सरोगणसेविते । शक्रलोकमितो याति संग्रामे निहतो नृपः ॥ वरारोहे! संग्राममें मारा गया नरेश अप्सराओंसे सेवित विमानपर आरूढ़ हो इस लोकसे इन्द्रलोकमें जाता है ॥ यावन्तो रोमकूपाः स्युस्तस्य गात्रेषु सुन्दरि । तावद्वर्षसहस्राणि शक्रलोके महीयते ॥