महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1235, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमनसा विनिवृत्तानां धर्मस्य निचयो महान् ॥ निवृत्ति परम धर्म है, निवृत्ति परम सुख है, जो मनसे विषयोंकी ओरसे निवृत्त हो गये हैं, उन्हें विशाल धर्मराशिकी प्राप्ति होती है ।। मनःपूर्वागमा धर्मा अधर्माश्च न संशयः । मनसा बध्यते चापि मुच्यते चापि मानवः ॥ निगृहीते भवेत् स्वर्गो विसृष्टे नरको ध्रुवः । इसमें संदेह नहीं कि धर्म और अधर्म पहले मनमें ही आते हैं। मनसे ही मनुष्य बँधता है और मनसे ही मुक्त होता है। यदि मनको वशमें कर लिया जाय, तब तो स्वर्ग मिलता है और यदि उसे खुला छोड़ दिया जाय तो नरककी प्राप्ति अवश्यम्भावी है ।। जीवाः पुराकृतेनैव तिर्यग्योनिसरीसृपाः । नानायोनिषु जायन्ते स्वकर्मपरिवेष्टिताः ॥ जीव अपने पूर्वकृत कर्मके ही फलसे पशु-पक्षी एवं कीट आदि होते हैं। अपने-अपने कर्मोंसे बँधे हुए प्राणी ही भिन्न-भिन्न योनियोंमें जन्म लेते हैं ।। जायमानस्य जीवस्य मृत्युः पूर्वं प्रजायते । सुखं वा यदि वा दुःखं यथापूर्वं कृतं तु वा ॥ जो जीव जन्म लेता है, उसकी मृत्यु पहले ही पैदा हो जाती है। मनुष्यने पूर्व जन्ममें जैसा कर्म किया है, तदनुसार ही उसे सुख या दुःख प्राप्त होता है ।। अप्रमत्तः प्रमत्तेषु विधिर्जागर्ति जन्तुषु । न हि तस्य प्रियः कश्चिन्न द्वेष्यो न च मध्यमः ॥ प्राणी प्रमादमें पड़कर भले ही सो जायँ, परंतु उनका प्रारब्ध या दैव प्रमादशून्य—सावधान होकर सदा जागता रहता है। उसका न कोई प्रिय है, न द्वेषपात्र है और न कोई मध्यस्थ ही है ।। समः सर्वेषु भूतेषु कालः कालं निरीक्षते । गतायुषो ह्याक्षिपते जीवः सर्वस्य देहिनः ॥ काल समस्त प्राणियोंके प्रति समान है। वह अवसरकी प्रतीक्षा करता रहता है। जिनकी आयु समाप्त हो गयी है, उन्हीं प्राणियोंका वह संहार करता है। वही समस्त देहधारियोंका जीवन है ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)