महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1256, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें[अन्धत्व और पंगुत्व आदि नाना प्रकारके दोषों और रोगोंके कारणभूत दुष्कर्मोंका
वर्णन]
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश मम प्रीतिविवर्धन ।
जात्यन्धाश्चैव दृश्यन्ते जाता वा नष्टचक्षुषः ॥
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।
उमाने कहा—भगवन्! मेरी प्रीति बढ़ानेवाले देवदेवेश्वर! इस संसारमें कुछ लोग
जन्मसे ही अन्धे दिखायी देते हैं और कुछ लोगोंके जन्म लेनेके पश्चात् उनकी आँखें नष्ट हो
जाती हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा कामकारेण परवेश्मसु लोलुपाः ।
परस्त्रियोऽभिवीक्षन्ते दुष्टेनैव स्वचक्षुषा ।।
अन्धीकुर्वन्ति ये मर्त्याः क्रोधलोभसमन्विताः ।
लक्षणज्ञाश्च रूपेषु अयथावत्प्रदर्शकाः ॥
एवंयुक्तसमाचाराः कालधर्मवशास्तु ते ।
दण्डिता यमदण्डेन निरयस्थाश्चिरं प्रिये ॥
श्रीमहेश्वरने कहा—प्रिये! जो पूर्वजन्ममें काम या स्वेच्छाचारवश पराये घरोंमें अपनी
लोलुपताका परिचय देते हैं और परायी स्त्रियोंपर अपनी दूषित दृष्टि डालते हैं तथा जो
मनुष्य क्रोध और लोभके वशीभूत होकर दूसरोंको अन्धा बना देते हैं, अथवा रूपविषयक
लक्षणोंको जानकर उसका मिथ्या प्रदर्शन करते हैं। ऐसे आचारवाले मनुष्य मृत्युको प्राप्त
होनेपर यमदण्डसे दण्डित हो चिरकालतक नरकोंमें पड़े रहते हैं ।।
यदि चेन्मानुषं जन्म लभेरंस्ते तथापि वा ।
स्वभावतो वा जाता वा अन्धा एव भवन्ति ते ॥
अक्षिरोगयुता वापि नास्ति तत्र विचारणा ॥
उसके बाद यदि वे मनुष्ययोनिमें जन्म लेते हैं, तब स्वभावतः अन्धे होते हैं अथवा
जन्म लेनेके बाद अन्धे हो जाते हैं या सदा ही नेत्ररोगसे पीड़ित रहते हैं। इस विषयमें विचार
करनेकी आवश्यकता नहीं है ।।
उमोवाच
मुखरोगयुताः केचिद् दृश्यन्ते सततं नराः ।
दन्तकण्ठकपोलस्थैर्व्याधिभिर्बहुपीडिताः ॥
आदिप्रभृति वै मर्त्या जाता वाप्यथ कारणात् ।