महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआघातवधबन्धैश्च वृथा दण्डेन मोहिताः ।।
इष्टनाशकरा ये तु अपथ्याहारदा नराः ।
चिकित्सका वा दुष्टाश्च द्वेषलोभसमन्विताः ।।
निर्दयाः प्राणिहिंसायां मलदाश्चित्तनाशनाः ।।
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
यदि वै मानुषं जन्म लभेरंस्तेषु दुःखिताः ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो मनुष्य पहले मोहवश आघात, वध, बन्धन तथा व्यर्थ दण्डके द्वारा दूसरोंके रूपका नाश करते हैं, किसीकी प्रिय वस्तु नष्ट कर देते हैं। चिकित्सक होकर दूसरोंको अपथ्य भोजन देते हैं, द्वेष और लोभके वशीभूत होकर दुष्टता करते हैं, प्राणियोंकी हिंसाके लिये निर्दय बन जाते हैं, मल देते और दूसरोंकी चेतनाका नाश करते हैं, शोभने! ऐसे आचरणवाले पुरुष पुनर्जन्मके समय यदि मनुष्य-जन्म पाते हैं तो मनुष्योंमें सदा दुःखी ही रहते हैं ।।
अत्र ते क्लेशसंयुक्ताः कुष्ठरोगशतैर्वृताः ।।
केचित् त्वग्दोषसंयुक्ता व्रणकुष्ठैश्च संयुताः ।
श्वित्रकुष्ठयुता वापि बहुधा कुष्ठसंयुताः ।।
भवन्त्येव नरा देवि यथा येन कृतं फलम् ।।
उस जन्ममें वे सैकड़ों कुष्ठ रोगोंसे घिरकर क्लेशसे पीड़ित होते हैं। कोई चर्मदोषसे युक्त होते हैं, कोई व्रणकुष्ठ (कोढ़के घाव) से पीड़ित होते हैं अथवा कोई सफेद कोढ़से लांछित दिखायी देते हैं। देवि! जिसने जैसा किया है उसके अनुसार फल पाकर वे सब मनुष्य नाना प्रकारके कुष्ठ रोगोंके शिकार हो जाते हैं ।।
उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचिदङ्गहीनाश्च पङ्गवः ।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
उमाने पूछा— भगवन्! किस कर्मके विपाकसे कुछ मनुष्य अंगहीन एवं पंगु हो जाते हैं, यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मनुजा देवि लोभमोहसमावृताः ।
प्राणिनां प्राणहिंसार्थमङ्गविघ्नं प्रकुर्वते ।।
शस्त्रेणोत्कृत्य वा देवि प्राणिनां चेष्टनाशकाः ।।
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
तदङ्गहीना वै प्रेत्य भवन्त्येव न संशयः ।।
स्वभावतो वा जाता वा पङ्गवस्ते भवन्ति वै ।।