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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1265, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1265

ऐसा होता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि सर्वप्राणिषु निर्दयाः ।

घ्नन्ति बालांश्च भुञ्जन्ते मृगाणां पक्षिणामपि ।।

गुरुविद्वेषिणश्चैव परपुत्राभ्यसूयकाः ।

पितृपूजां न कुर्वन्ति यथोक्तां चाष्टकादिभिः ।।

एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।

मानुष्यं सुचिरात् प्राप्य निरपत्या भवन्ति ते ।

पुत्रशोकयुताश्चापि नास्ति तत्र विचारणा ।।

श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! जो मनुष्य पहले समस्त प्राणियोंके प्रति निर्दयताका बर्ताव

करते हैं, मृगों और पक्षियोंके भी बच्चोंको मारकर खा जाते हैं, गुरुसे द्वेष रखते, दूसरोंके

पुत्रोंके दोष देखते हैं, पार्वण आदि श्राद्धोंके द्वारा शास्त्रोक्त रीतिसे पितरोंकी पूजा नहीं

करते; शोभने! ऐसे आचरणवाले जीव फिर जन्म लेनेपर दीर्घकालके पश्चात् मानवयोनिको

पाकर संतानहीन तथा पुत्रशोकसे संतप्त होते हैं; इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं

है ।।

उमोवाच

भगवन् मानुषाः केचित् प्रदृश्यन्ते सुदुःखिताः ।

उद्वेगवासनिरताः सोद्वेगाश्च यतव्रताः ।।

नित्यं शोकसमाविष्टा दुर्गताश्च तथैव च ।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।

उमाने कहा—भगवन्! मनुष्योंमें कुछ लोग अत्यन्त दुःखी दिखायी देते हैं। उनके

निवासस्थानमें उद्वेगका वातावरण छाया रहता है। वे उद्विग्न रहकर संयमपूर्वक व्रतका

पालन करते हैं। नित्य शोकमग्न तथा दुर्गतिग्रस्त रहते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता

है? यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा नित्यमुत्कोचनपरायणाः ।

भीषयन्ति परान् नित्यं विकुर्वन्ति तथैव च ।।

ऋणवृद्धिकराश्चैव दरिद्रेभ्यो यथेष्टतः ।

ये श्वभिः क्रीडमानाश्च त्रासयन्ति वने मृगान् ।

प्राणिहिंसां तथा देवि कुर्वन्ति च यतस्ततः ।।

येषां गृहेषु वै श्वानः त्रासयन्ति वृथा नरान् ।।

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