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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1272, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1272

जो उद्देश्य-सिद्धिकी कामना रखकर क्रोधपूर्वक कोई असत् कर्म करता है, उसके उस

कर्मका किसी तरह नाश नहीं होता है ।।

अभिसंधिकृतस्यैव नैव नाशोऽस्ति कर्मणः ।

अश्वमेधसहस्रैश्च प्रायश्चित्तशतैरपि ।।

अन्यथा यत् कृतं पापं प्रमादाद् वा यदृच्छया ।

प्रायश्चित्ताश्वमेधाभ्यां श्रेयसा तत् प्रणश्यति ।।

फलाभिसन्धिपूर्वक किये गये कर्मोंका नाश सहस्रों अश्वमेधयज्ञों और सैकड़ों

प्रायश्चित्तोंसे भी नहीं होता। इसके सिवा और प्रकारसे—असावधानी या दैवेच्छासे जो पाप

बन जाता है, वह प्रायश्चित्त और अश्वमेधयज्ञसे तथा दूसरे किसी श्रेष्ठ कर्मसे नष्ट हो जाता

है ।।

विद्ध्येवं पापके कार्ये निर्विशंका भव प्रिये ।

इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ।।

प्रिये! इस प्रकार पाप कर्मके विषयमें तुम्हारा यह संदेह अब दूर हो जाना चाहिये।

देवि! यह विषय मैंने तुम्हें बताया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।

उमोवाच

भगवन् देवदेवेश मानुषाश्चेतरा अपि ।

म्रियन्ते मानुषा लोके कारणाकारणादपि ।।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।

उमाने पूछा—भगवन्! देवदेवेश्वर! जगत्के मनुष्य तथा दूसरे प्राणी, जो किसी

कारणसे या अकारण भी मृत्युको प्राप्त हो जाते हैं, इसमें कौन-सा कर्मविपाक कारण है?

यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि कारणाकारणादपि ।

यथासुभिर्वियुज्यन्ते प्राणिनः प्राणिनिर्दयाः ।।

तथैव ते प्राप्नुवन्ति यथैवात्मकृतं फलम् ।

विषदास्तु विषेणैव शस्त्रैः शस्त्रेण घातकाः ।।

श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! जो निर्दयी मनुष्य पहले किसी कारणसे या अकारण भी

दूसरे प्राणियोंके प्राण लेते हैं, वे उसी प्रकार अपनी करनीका फल पाते हैं। विष देनेवाले

विषसे ही मरते हैं और शस्त्रद्वारा दूसरोंकी हत्या करनेवाले लोग स्वयं भी जन्मान्तरमें

शस्त्रोंके आघातसे ही मारे जाते हैं ।।

इति सत्यं प्रजानीहि लोके तत्र विधिं प्रति ।

कर्मकर्ता नरोऽभोक्ता स नास्ति दिवि वा भुवि ।

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