महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1274, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रजानां तु हितार्थाय शुभाशुभविधिं प्रति । अनागतमतिक्रान्तं ज्योतिश्चक्रेण बोध्यते ॥ प्रजाके हितके लिये ज्यौतिषचक्र (ग्रह-नक्षत्र मण्डल)-के द्वारा भूत और भविष्यके शुभाशुभ फलका बोध कराया जाता है ॥ किंतु तत्र शुभं कर्म सुग्रहैस्तु निवेद्यते । दुष्कृतस्याशुभैरेव समवायो भवेदिति ॥ किंतु वहाँ शुभ कर्मफलकी सूचना (उत्तम) शुभ ग्रहोंद्वारा प्राप्त होती है और दुष्कर्मके फलकी सूचना अशुभ ग्रहोंद्वारा ॥ केवलं ग्रहनक्षत्रं न करोति शुभाशुभम् । सर्वमात्मकृतं कर्म लोकवादो ग्रहा इति ॥ केवल ग्रह और नक्षत्र ही शुभाशुभ कर्मफलको उपस्थित नहीं करते हैं। सारा अपना ही किया हुआ कर्म शुभाशुभ फलका उत्पादक होता है। ग्रहोंने कुछ किया है—यह कथन लोगोंका प्रवादमात्र है ॥
उमोवाच
भगवन् विविधं कर्म कृत्वा जन्तुः शुभाशुभम् । किं तयोः पूर्वतरं भुङ्क्ते जन्मान्तरे पुनः ॥ एष मे संशयो देव तं मे त्वं छेत्तुमर्हसि । **उमाने पूछा—**भगवन्! जीव नाना प्रकारके शुभाशुभ कर्म करके जब दूसरा जन्म धारण करता है, तब दोनोंमेंसे पहले किसका फल भोगता है, शुभका या अशुभका? देव! यह मेरा संशय है। आप इसे मिटा दीजिये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
स्थाने संशयितं देवि तत् ते वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥ अशुभं पूर्वमित्याहुरपरे शुभमित्यपि । मिथ्या तदुभयं प्रोक्तं केवलं तद् ब्रवीमि ते ॥ **श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! तुम्हारा संदेह उचित ही है, अब मैं तुम्हें इसका यथार्थ उत्तर देता हूँ। कुछ लोगोंका कहना है कि पहले अशुभ कर्मका फल मिलता है, दूसरे कहते हैं कि पहले शुभ कर्मका फल प्राप्त होता है। परंतु ये दोनों ही बातें मिथ्या कही गयी हैं। सच्ची बात क्या है? यह मैं तुम्हें बता रहा हूँ ॥ भुञ्जानाश्चापि दृश्यन्ते क्रमशो भुवि मानवाः । ऋद्धिं हानिं सुखं दुःखं तत् सर्वमभयं भयम् ॥ इस पृथ्वीपर मनुष्य क्रमशः दोनों प्रकारके फल भोगते देखे जाते हैं। कभी धनकी वृद्धि होती है कभी हानि, कभी सुख मिलता है कभी दुःख, कभी निर्भयता रहती है और कभी