भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1276, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1276

जब कालसे आक्रान्त होकर शरीर जरावस्थासे जर्जर हो जाता है, कोई कर्म करने योग्य नहीं रह जाता और सर्वथा गल जाता है, तब देहधारी जीव उसे त्यागकर चल देता है॥

नित्यस्यानित्यसंत्यागाल्लोके तन्मरणं विदुः ।
कालं नातिक्रमेरेन् हि सदेवासुरमानवाः ॥
नित्य जीवात्मा जब अनित्य शरीरको त्यागकर चला जाता है, तब लोकमें उस प्राणीकी मृत्यु हुई मानी जाती है। देवता, असुर और मनुष्य कोई भी कालका उल्लंघन नहीं कर सकते॥

यथाऽऽकाशे न तिष्ठेत द्रव्यं किंचिदचेतनम् ।
तथा धावति कालोऽयं क्षणं किंचिन्न तिष्ठति ॥
जैसे आकाशमें कोई भी जड द्रव्य स्थिर नहीं रह सकता, उसी प्रकार यह काल निरन्तर दौड़ लगाता रहता है। एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता॥

स पुनर्जायतेऽन्यत्र शरीरं नवमाविशन् ।
एवं लोकगतिर्नित्यमादिप्रभृति वर्तते ॥
वह जीव फिर किसी दूसरे शरीरमें प्रवेश करके अन्यत्र जन्म लेता है। इस प्रकार आदि कालसे ही लोककी सदा ऐसी ही गति चल रही है॥

उमोवाच

भगवन् प्राणिनो बाला दृश्यन्ते मरणं गताः ।
अतिवृद्धाश्च जीवन्तो दृश्यन्ते चिरजीविनः ॥
उमाने पूछा— भगवन्! इस संसारमें बाल्यावस्थामें भी प्राणियोंकी मृत्यु होती देखी जाती है और अत्यन्त वृद्ध मनुष्य भी चिरजीवी होकर जीवित दिखायी देते हैं॥

केवलं कालमरणं न प्रमाणं महेश्वर ।
तस्मान्मे संशयं ब्रूहि प्राणिनां जीवकारणम् ॥
महेश्वर! केवल काल-मृत्यु अर्थात् वृद्धावस्थामें ही मृत्यु होनेकी बात प्रमाणभूत नहीं रह गयी है; अतः प्राणियोंके जीवनके लिये उठे हुए मेरे इस संदेहका आप निवारण कीजिये॥

श्रीमहेश्वर उवाच

शृणु तत् कारणं देवि निर्णयस्त्वेक एव सः ।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! इसका कारण सुनो। इस विषयमें एक ही निर्णय है॥

यावत् पूर्वकृतं कर्म तावज्जीवति मानवः ।
तत्र कर्मवशाद् बाला म्रियन्ते कालसंक्षयात् ॥
चिरं जीवन्ति वृद्धाश्च तथा कर्मप्रमाणतः ।