भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1399, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1399

इस सम्पूर्ण पृथ्वीके स्रष्टा और तीनों लोकोंके स्वामी भी वे ही हैं। वे ही चराचर प्राणियोंका संहार भी करते हैं ॥ ६ ॥ स हि देववरः साक्षाद् देवनाथः परंतपः । सर्वज्ञः सर्वसंश्लिष्टः सर्वगः सर्वतोमुखः ॥ ७ ॥ वे देवताओंमें श्रेष्ठ, देवताओंके रक्षक, शत्रुओंको संताप देनेवाले, सर्वज्ञ, सबमें ओतप्रोत, सर्वव्यापक तथा सब ओर मुखवाले हैं ॥ ७ ॥ परमात्मा हृषीकेशः सर्वव्यापी महेश्वरः । न तस्मात् परमं भूतं त्रिषु लोकेषु किंचन ॥ ८ ॥ वे ही परमात्मा, इन्द्रियोंके प्रेरक और सर्वव्यापी महेश्वर हैं। तीनों लोकोंमें उनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है ॥ ८ ॥ सनातनो वै मधुहा गोविन्द इति विश्रुतः । स सर्वान् पार्थिवान् संख्ये घातयिष्यति मानदः ॥ ९ ॥ वे ही सनातन, मधुसूदन और गोविन्द आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं। सज्जनोंको आदर देनेवाले वे भगवान् श्रीकृष्ण महाभारत-युद्धमें समस्त राजाओंका संहार करायेंगे ॥ ९ ॥ सुरकार्यार्थमुत्पन्नो मानुषं वपुरास्थितः । न हि देवगणाः सक्तास्त्रिविक्रमविनाकृताः ॥ १० ॥ वे देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये पृथ्वीपर मानव-शरीर धारण करके प्रकट हुए हैं। उन भगवान् त्रिविक्रमकी शक्ति और सहायताके बिना सम्पूर्ण देवता भी कोई कार्य नहीं कर सकते ॥ १० ॥ भुवने देवकार्याणि कर्तुं नायकवर्जिताः । नायकः सर्वभूतानां सर्वदेवनमस्कृतः ॥ ११ ॥ संसारमें नेताके बिना देवता अपना कोई भी कार्य करनमें असमर्थ हैं और ये भगवान् श्रीकृष्ण सब प्राणियोंके नेता हैं। इसलिये समस्त देवता उनके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं ॥ ११ ॥ एतस्य देवनाथस्य देवकार्यपरस्य च । ब्रह्मभूतस्य सततं ब्रह्मर्षिशरणस्य च ॥ १२ ॥ ब्रह्मा वसति गर्भस्थः शरीरे सुखसंस्थितः । शर्वः सुखं संश्रितश्च शरीरे सुखसंस्थितः ॥ १३ ॥ देवताओंकी रक्षा और उनके कार्यसाधनमें संलग्न रहनेवाले वे भगवान् वासुदेव ब्रह्मस्वरूप हैं। वे ही ब्रह्मर्षियोंको सदा शरण देते हैं। ब्रह्माजी उनके शरीरके भीतर अर्थात् उनके गर्भमें बड़े सुखके साथ रहते हैं। सदा सुखी रहनेवाला मैं शिव भी उनके श्रीविग्रहके भीतर सुखपूर्वक निवास करता हूँ ॥ १२-१३ ॥ सर्वाः सुखं संश्रिताश्च शरीरे तस्य देवताः ।