भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1410, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1410

सुनकर हम इस निश्चयपर पहुँच गये हैं कि वे ब्रह्मभूत सनातन पुरुष आप ही हैं। जिनके लिये हिमालयके शिखरपर महादेवजीने हमलोगोंको उपदेश दिया था ।। ५-६ ।। द्वितीयं त्वद्भुतमिदं त्वत्तेजः कृतमद्य वै । दृष्ट्वा च विस्मिताः कृष्ण सा च नः स्मृतिरागता ।। ७ ।। श्रीकृष्ण! आपके तेजसे दूसरी अद्भुत घटना आज यह घटित हुई है, जिसे देखकर हम चकित हो गये हैं और हमें पूर्वकालकी वह शंकरजीवाली बात पुनः स्मरण हो रही है ।। ७ ।। एतत् ते देवदेवस्य माहात्म्यं कथितं प्रभो । कपर्दिनो गिरीशस्य महाबाहो जनार्दन ।। ८ ।। प्रभो! महाबाहु जनार्दन! यह मैंने आपके समक्ष जटाजूटधारी देवाधिदेव गिरीशके माहात्म्यका वर्णन किया है ।। ८ ।। इत्युक्तः स तदा कृष्णस्तपोवननिवासिभिः । मानयामास तान् सर्वानृषीन् देवकीनन्दनः ।। ९ ।। तपोवन-निवासी मुनियोंके ऐसा कहनेपर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने उस समय उन सबका विशेष सत्कार किया ।। ९ ।। अथर्षयः सम्प्रहृष्टाः पुनस्ते कृष्णमब्रुवन् । पुनः पुनः दर्शयास्मान् सदैव मधुसूदन ।। १० ।। तदनन्तर वे महर्षि पुनः हर्षमें भरकर श्रीकृष्णसे बोले—'मधुसूदन! आप सदा ही हमें बारंबार दर्शन देते रहें ।। १० ।। न हि नः सा रतिः स्वर्गे या च त्वद्दर्शने विभो । तदृतं च महाबाहो यदाह भगवान् भवः ।। ११ ।। 'प्रभो! आपके दर्शनमें हमारा जितना अनुराग है, उतना स्वर्गमें भी नहीं है। महाबाहो! भगवान् शिवने जो कहा था, वह सर्वथा सत्य हुआ ।। ११ ।। एतत् ते सर्वमाख्यातं रहस्यमरिकर्शन । त्वमेव ह्यर्थतत्त्वज्ञः पृष्टोऽस्मान् पृच्छसे यदा ।। १२ ।। तदस्माभिरिदं गुह्यं त्वत्प्रियार्थमुदाहृतम् । न च तेऽविदितं किंचित्त्रिषु लोकेषु विद्यते ।। १३ ।। 'शत्रुसूदन! यह सारा रहस्य मैंने आपसे कहा है, आप ही अर्थ-तत्त्वके ज्ञाता हैं। हमने आपसे पूछा था, परंतु आप स्वयं ही जब हमसे प्रश्न करने लगे, तब हमलोगोंने आपकी प्रसन्नताके लिये इस गोपनीय रहस्यका वर्णन किया है। तीनों लोकोंमें कोई ऐसी बात नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो ।। १२-१३ ।। जन्म चैव प्रसूतिश्च यच्चान्यत् कारणं विभो । वयं तु बहुचापल्यादशक्ता गुह्यधारणे ।। १४ ।।