महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंदेशो देवपूजार्थं तं तथा कुरु पाण्डव ॥ ५३ ॥
पाण्डुनन्दन! उन अनिन्द्य महात्मा देवर्षि नारदजीका ही यह संदेश है कि महादेवजीकी पूजा करनी चाहिये। इसलिये तुम भी ऐसा ही करो ॥ ५३ ॥
एतदत्यद्भुतं वृत्तं पुण्ये हि भवति प्रभो ।
वासुदेवस्य कौन्तेय स्थाणोश्चैव स्वभावजम् ॥ ५४ ॥
प्रभो! कुन्तीनन्दन! भगवान् श्रीकृष्ण और महादेवजीका यह अद्भुत एवं स्वाभाविक वृत्तान्त पूर्वकालमें पुण्यमय पर्वत हिमालयपर संघटित हुआ था ॥ ५४ ॥
दशवर्षसहस्राणि बदर्यामेष शाश्वतः ।
तपश्चचार विपुलं सह गाण्डीवधन्वना ॥ ५५ ॥
इन सनातन श्रीकृष्णने गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ (नर-नारायणरूपमें रहकर) बदरिकाश्रममें दस हजार वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की थी ॥ ५५ ॥
त्रियुगौ पुण्डरीकाक्षौ वासुदेवधनञ्जयौ ।
विदितौ नारदादेतौ मम व्यासाच्च पार्थिव ॥ ५६ ॥
पृथ्वीनाथ! कमलनयन! श्रीकृष्ण और अर्जुन—ये दोनों सत्ययुग आदि तीनों युगोंमें प्रकट होनेके कारण त्रियुग कहलाते हैं। देवर्षि नारद तथा व्यासजीने इन दोनोंके स्वरूपका परिचय दिया था ॥ ५६ ॥
बाल एव महाबाहुश्चकार कदनं महत् ।
कंसस्य पुण्डरीकाक्षो ज्ञातित्राणार्थकारणात् ॥ ५७ ॥
महाबाहु कमलनयन श्रीकृष्णने बचपनमें ही अपने बन्धु-बान्धवोंकी रक्षाके लिये कंसका बड़ा भारी संहार किया था ॥ ५७ ॥
कर्मणामस्य कौन्तेय नान्तं संख्यातुमुत्सहे ।
शाश्वतस्य पुराणस्य पुरुषस्य युधिष्ठिर ॥ ५८ ॥
कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर! इन सनातन पुराणपुरुष श्रीकृष्णके चरित्रोंकी कोई सीमा या संख्या नहीं बतायी जा सकती ॥ ५८ ॥
ध्रुवं श्रेयः परं तात भविष्यति तवोत्तमम् ।
यस्य ते पुरुषव्याघ्रः सखा चायं जनार्दनः ॥ ५९ ॥
तात! तुम्हारा तो अवश्य ही परम उत्तम कल्याण होगा; क्योंकि ये पुरुषसिंह जनार्दन तुम्हारे मित्र हैं ॥ ५९ ॥
दुर्योधनं तु शोचामि प्रेत्य लोकेऽपि दुर्मतिम् ।
यत्कृते पृथिवी सर्वा विनष्टा सहयद्विपा ॥ ६० ॥
दुर्बुद्धि दुर्योधन यद्यपि परलोकमें चला गया है, तो भी मुझे तो उसीके लिये अधिक शोक हो रहा है; क्योंकि उसीके कारण हाथी, घोड़े आदि वाहनोंसहित सारी पृथ्वीका नाश हुआ है ॥ ६० ॥