महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1419, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्तुवन् नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ ४ ॥ भीष्मजीने कहा—बेटा! स्थावर-जंगमरूप संसारके स्वामी, ब्रह्मादि देवोंके देव, देश-काल और वस्तुसे अपरिच्छिन्न, क्षर-अक्षरसे श्रेष्ठ पुरुषोत्तमका सहस्रनामोंके द्वारा निरन्तर तत्पर रहकर गुण-संकीर्तन करनेसे पुरुष सब दुःखोंसे पार हो जाता है ॥ ४ ॥
तमेव चार्चयन् नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् । ध्यायन् स्तुवन् नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥ ५ ॥ तथा उसी विनाशरहित पुरुषका सब समय भक्तिसे युक्त होकर पूजन करनेसे, उसीका ध्यान करनेसे तथा स्तवन एवं नमस्कार करनेसे पूजा करनेवाला सब दुःखोंसे छूट जाता है ॥ ५ ॥
अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् । लोकाध्यक्षं स्तुवन् नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥ ६ ॥ उस जन्म-मृत्यु आदि छः भाव-विकारोंसे रहित, सर्वव्यापक, सम्पूर्ण लोकोंके महेश्वर, लोकाध्यक्ष देवकी निरन्तर स्तुति करनेसे मनुष्य सब दुःखोंसे पार हो जाता है ॥ ६ ॥
ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् । लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥ ७ ॥ ब्राह्मणोंके हितकारी, सब धर्मोंको जाननेवाले, प्राणियोंकी कीर्तिको बढ़ानेवाले, सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी, समस्त भूतोंके उत्पत्ति-स्थान एवं संसारके कारणरूप परमेश्वरका स्तवन करनेसे मनुष्य सब दुःखोंसे छूट जाता है ॥ ७ ॥
एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः । यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥ ८ ॥ सम्पूर्ण धर्मोंमें मैं इसी धर्मको सबसे बड़ा मानता हूँ कि मनुष्य कमलनयन भगवान् वासुदेवका भक्तिपूर्वक गुण-संकीर्तनरूप स्तुतियोंसे सदा अर्चन करे ॥ ८ ॥
परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः । परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥ ९ ॥ पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् । दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ १० ॥ यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे । यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ ११ ॥ तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते । विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम् ॥ १२ ॥ पृथ्वीपते! जो परम महान् तेजःस्वरूप है, जो परम महान् तपःस्वरूप है, जो परम महान् ब्रह्म है, जो सबका परम आश्रय है, जो पवित्र करनेवाले तीर्थादिकोंमें परम पवित्र है, मंगलोंका भी मंगल है, देवोंका भी देव है तथा जो भूतप्राणियोंका अविनाशी पिता है,