महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1450, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंइन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, सत्त्व, तेज, बल, धीरज, क्षेत्र, (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा)—ये सब-के-सब श्रीवासुदेवके रूप हैं, ऐसा वेद कहते हैं ।। १३६ ।।
सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते ।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ।। १३७ ।।
सब शास्त्रोंमें आचार प्रथम माना जाता है, आचारसे ही धर्मकी उत्पत्ति होती है और धर्मके स्वामी भगवान् अच्युत हैं ।। १३७ ।।
ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः ।
जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ।। १३८ ।।
ऋषि, पितर, देवता, पञ्च महाभूत, धातुएँ और स्थावर-जंगमात्मक सम्पूर्ण जगत्—ये सब नारायणसे ही उत्पन्न हुए हैं ।। १३८ ।।
योगो ज्ञानं तथा सांख्यं विद्या शिल्पादि कर्म च ।
वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत् सर्वं जनार्दनात् ।। १३९ ।।
योग, ज्ञान, सांख्य, विद्याएँ, शिल्प आदि कर्म, वेद, शास्त्र और विज्ञान—ये सब विष्णुसे उत्पन्न हुए हैं ।। १३९ ।।
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः ।
त्रींल्लोकान् व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ।। १४० ।।
वे समस्त विश्वके भोक्ता और अविनाशी विष्णु ही एक ऐसे हैं, जो अनेक रूपोंमें विभक्त होकर भिन्न-भिन्न भूतविशेषोंके अनेक रूपोंको धारण कर रहे हैं तथा त्रिलोकीमें व्याप्त होकर सबको भोग रहे हैं ।। १४० ।।
इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् ।
पठेद् य इच्छेत् पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ।। १४१ ।।
जो पुरुष परम श्रेय और सुख पाना चाहता हो, वह भगवान् व्यासजीके कहे हुए इस विष्णुसहस्रनामस्तोत्रका पाठ करे ।। १४१ ।।
विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभवाप्ययम् ।
भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ।। १४२ ।।
जो विश्वके ईश्वर जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश करनेवाले जन्मरहित कमललोचन भगवान् विष्णुका भजन करते हैं, वे कभी पराभव नहीं पाते हैं ।। १४२ ।।
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यामनुशासनपर्वणि
दानधर्मपर्वणि विष्णुसहस्रनामकथने
एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत व्यासनिर्र्मित शतसाहस्रीय संहितासम्बन्धी अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विष्णुसहस्रनामकथनविषयक एक सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा