भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1461, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1461

उस घरके निवासी, जो परब्रह्मस्वरूप गायत्री-मन्त्रके गुणोंका कीर्तन सुनते हैं, उन्हें कभी दुःख नहीं होता है तथा वे परमगतिको प्राप्त होते हैं ॥ ७२ ॥

गवां मध्ये तु पठतो गावोऽस्य बहुवत्सलाः ।
प्रस्थाने वा प्रवासे वा सर्वावस्थां गतः पठेत् ॥ ७३ ॥
गौओंके बीचमें गायत्रीका जप करनेवाले पुरुषपर गौओंका वात्सल बहुत बढ़ जाता है। प्रस्थान-कालमें अथवा परदेशमें सभी अवस्थाओंमें मनुष्यको इसका जप करना चाहिये ॥ ७३ ॥

जपतां जुह्वतां चैव नित्यं च प्रयतात्मनाम् ।
ऋषीणां परमं जप्यं गुह्यमेतन्नराधिप ॥ ७४ ॥
नरेश्वर! सदा शुद्धचित्त होकर जप करे, होम करनेवाले ऋषियोंके लिये यह परम गोपनीय मन्त्र है ॥ ७४ ॥

याथातथ्येन सिद्धस्य इतिहासं पुरातनम् ।
पराशरमतं दिव्यं शकाय कथितं पुरा ॥ ७५ ॥
यह सिद्धिको प्राप्त हुए महर्षि वेदव्यासका कहा हुआ यथार्थ एवं प्राचीन इतिहास है। इसमें पराशर मुनिके दिव्य मतका वर्णन है। पूर्वकालमें इन्द्रको इसका उपदेश किया गया था ॥ ७५ ॥

तदेतत् ते समाख्यातं तथ्यं ब्रह्म सनातनम् ।
हृदयं सर्वभूतानां श्रुतिरेषा सनातनी ॥ ७६ ॥
वही यह मन्त्र तुमसे कहा गया है। यह गायत्री-मन्त्र सत्य एवं सनातन ब्रह्मरूप है। यह सम्पूर्ण भूतोंका हृदय एवं सनातन श्रुति है ॥ ७६ ॥

सोमादित्यान्वयाः सर्वे राघवाः कुरवस्तथा ।
पठन्ति शुचयो नित्यं सावित्रीं प्राणिनां गतिम् ॥ ७७ ॥
चन्द्र, सूर्य, रघु और कुरुके वंशमें उत्पन्न हुए सभी राजा पवित्र भावसे प्रतिदिन गायत्री-मन्त्रका जप करते आये हैं। गायत्री संसारके प्राणियोंकी परमगति है ॥ ७७ ॥

अभ्यासे नित्यं देवानां सप्तर्षीणां ध्रुवस्य च ।
मोक्षणं सर्वकृच्छ्राणां मोचयत्यशुभात् सदा ॥ ७८ ॥
प्रतिदिन देवताओं, सप्तर्षियों और ध्रुवका बारंबार स्मरण करनेसे समस्त संकटोंसे छुटकारा मिल जाता है। उनका कीर्तन सदा ही अशुभ अर्थात् पापके बन्धनसे मुक्त कर देता है ॥ ७८ ॥

वृद्धैः काश्यपगौतमप्रभृतिभिर्भृग्वङ्गिरोऽत्र्यादिभिः
शुक्रागस्त्यबृहस्पतिप्रभृतिभिर्ब्रह्मर्षिभिः सेवितम् ।
भारद्वाजमतमृचीकतनयैः प्राप्तं वसिष्ठात् पुनः
सावित्रीमधिगम्य शक्रवसुभिः कृत्स्ना जिता दानवाः ॥ ७९ ॥