महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यमन्त्रयत संतुष्टो द्विजश्चैनं वरैस्त्रिभिः ।। ६ ।।
स वरैश्छन्दितस्तेन नृपो वचनमब्रवीत् ।
सहस्रबाहुर्भूयां वै चमूमध्ये गृहेऽन्यथा ।। ७ ।।
मम बाहुसहस्रं तु पश्यतां सैनिका रणे ।
विक्रमेण महीं कृत्स्नां जयेयं संशितव्रत ।। ८ ।।
तां च धर्मेण सम्प्राप्य पालयेयमतन्द्रितः ।
चतुर्थं तु वरं याचे त्वामहं द्विजसत्तम ।। ९ ।।
तं ममानुग्रहकृते दातुमर्हस्यनिन्दित ।
अनुशासन्तु मां सन्तो मिथ्योद्वृत्तं त्वदाश्रयम् ।। १० ।।
विप्रवर दत्तात्रेय उसके ऊपर बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने उसे तीन वर माँगनेकी आज्ञा दी। उनके द्वारा वर माँगनेकी आज्ञा मिलनेपर राजाने कहा—'भगवन्! मैं युद्धमें तो हजार भुजाओंसे युक्त रहूँ; किन्तु घरपर मेरी दो ही बाँहें रहें। रणभूमिमें सभी सैनिक मेरी एक हजार भुजाएँ देखें। कठोर व्रतका पालन करनेवाले गुरुदेव! मैं अपने पराक्रमसे सम्पूर्ण पृथ्वीको जीत लूँ। इस प्रकार पृथ्वीको धर्मके अनुसार प्राप्तकर मैं आलस्यरहित हो उसका पालन करूँ। द्विजश्रेष्ठ! इन तीन वरोंके सिवा एक चौथा वर भी मैं आपसे माँगता हूँ। अनिन्द्य महर्षे! मुझपर कृपा करनेके लिये आप वह वर भी अवश्य प्रदान करें। मैं आपका आश्रित भक्त हूँ। यदि कभी मैं सन्मार्गका परित्याग करके असत्य मार्गका आश्रय लूँ तो श्रेष्ठ पुरुष मुझे राहपर लानेके लिये शिक्षा दें' ।। ६—१० ।।