महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1472, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंवायुर्वे देवदूतोऽस्मि हितं त्वां प्रब्रवीम्यहम् ॥ २६ ॥
यह बात सुनकर कार्तवीर्यने पूछा—‘महानुभाव! आप कौन हैं?’ तब वायु देवताने उससे कहा—‘राजन्! मैं देवताओंका दूत वायु हूँ और तुम्हें हितकी बात बता रहा हूँ’ ॥ २६ ॥
अर्जुन उवाच
अहो त्वयायं विप्रेषु भक्तिरागः प्रदर्शितः ।
यादृशं पृथिवीभूतं तादृशं ब्रूहि मे द्विजम् ॥ २७ ॥
कार्तवीर्य अर्जुनने कहा— वायुदेव! ऐसी बात कहकर आपने ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति और अनुरागका परिचय दिया है। अच्छा आपकी जानकारीमें यदि पृथिवीके समान क्षमाशील ब्राह्मण हो तो ऐसे द्विजको मुझे बताइये ॥ २७ ॥
वायोर्वा सदृशं किंचिद् ब्रूहि त्वं ब्राह्मणोत्तमम् ।
अपां वै सदृशं वह्नेः सूर्यस्य नभसोऽपि वा ॥ २८ ॥
अथवा यदि कोई जल, अग्नि, सूर्य, वायु एवं आकाशके समान श्रेष्ठ ब्राह्मण हो तो उसको भी बताइये ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे ब्राह्मणमाहात्म्ये द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायुदेवता और अर्जुनके संवादके प्रसंगमें ब्राह्मणोंका माहात्म्यविषयक एक सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५२ ॥