महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1474, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनरेश्वर! समुद्र पहले मीठे जलसे भरा रहता था, परंतु ब्राह्मणोंके शापसे उसका पानी खारा हो गया ॥ ७ ॥
सुवर्णवर्णो निर्धूमः सङ्गतोर्ध्वशिखः कविः । क्रुद्धेनाङ्गिरसा शप्तो गुणैरेतैर्विवर्जितः ॥ ८ ॥ अग्निका रंग पहले सोनेके समान था, उसमेंसे धुआँ नहीं निकलता था और उसकी लपट सदा ऊपर की ओर ही उठती थी, किंतु क्रोधमें भरे हुए अंगिरा ऋषिने उसे शाप दे दिया। इसलिये अब उसमें ये पूर्वोक्त गुण नहीं रह गये ॥ ८ ॥
महत्तश्रूर्णितान् पश्य ये हासन्त महोदधिम् । सुवर्णधारिणा नित्यमवशप्ता द्विजातिना ॥ ९ ॥ देखो, उत्तम (ब्राह्मण) वर्णधारी ब्रह्मर्षि कपिलके शापसे दग्ध हुए सगर पुत्रोंकी, जो यज्ञसम्बन्धी अश्वकी खोज करते हुए यहाँ समुद्रतक आये थे, ये राखके ढेर पड़े हुए हैं ॥ ९ ॥
समो न त्वं द्विजातिभ्यः श्रेयो विद्धि नराधिप । गर्भस्थान् ब्राह्मणान् सम्यङ् नमस्यति किल प्रभुः ॥ १० ॥ राजन्! तुम ब्राह्मणोंकी समानता कदापि नहीं कर सकते। उनसे अपने कल्याणके उपाय जाननेका यत्न करो। राजा गर्भस्थ ब्राह्मणोंको भी भलीभाँति प्रणाम करता है ॥ १० ॥
दण्डकानां महद् राज्यं ब्राह्मणेन विनाशितम् । तालजंघं महाक्षत्रमौर्वेणैकेन नाशितम् ॥ ११ ॥ दण्डकारण्यका विशाल साम्राज्य एक ब्राह्मणने ही नष्ट कर दिया। तालजंघ नामवाले महान् क्षत्रियवंशका अकेले महात्मा और्वने संहार कर डाला ॥ ११ ॥
त्वया च विपुलं राज्यं बलं धर्मं श्रुतं तथा । दत्तात्रेयप्रसादेन प्राप्तं परमदुर्लभम् ॥ १२ ॥ स्वयं तुम्हें भी जो परम दुर्लभ विशाल राज्य, बल, धर्म तथा शास्त्रज्ञानकी प्राप्ति हुई है, वह विप्रवर दत्तात्रेयजीकी कृपासे ही सम्भव हुआ है ॥ १२ ॥
अग्निं त्वं यजसे नित्यं कस्माद् ब्राह्मणमर्जुन । स हि सर्वस्य लोकस्य हव्यवाट् किं न वेत्सि तम् ॥ १३ ॥ अर्जुन! अग्नि भी तो ब्राह्मण ही है। तुम प्रतिदिन उसका यजन क्यों करते हो? क्या तुम नहीं जानते कि अग्नि ही सम्पूर्ण लोकोंके हव्यवाहन (हविष्य पहुँचानेवाले) हैं ॥ १३ ॥
अथवा ब्राह्मणश्रेष्ठमनुभूतानुपालकम् । कर्तारं जीवलोकस्य कस्माज्जानन् विमुह्यसे ॥ १४ ॥ अथवा श्रेष्ठ ब्राह्मण प्रत्येक जीवकी रक्षा और जीव-जगत्की सृष्टि करनेवाला है। इस बातको जानते हुए भी तुम क्यों मोहमें पड़े हुए हो ॥ १४ ॥