महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1485, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
अत्रि और च्यवन ऋषिके प्रभावका वर्णन
भीष्म उवाच
इत्युक्तस्त्वर्जुनस्तूष्णीमभूद् वायुस्तमब्रवीत् ।
शृणु मे हैहयश्रेष्ठ कर्मात्रेः सुमहात्मनः ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! उनके ऐसा कहनेपर भी जब कार्तवीर्य अर्जुन कोई उत्तर न देकर चुप ही बैठा रहा, तब वायु देवता पुनः इस प्रकार बोले—हैहयश्रेष्ठ! अब तुम मुझसे महात्मा अत्रिके महान् कर्मका वर्णन सुनो ॥ १ ॥
घोरे तमस्ययुध्यन्त सहिता देवदानवाः ।
अविध्यत शरैस्तत्र स्वर्भानुः सोमभास्करौ ॥ २ ॥
'प्राचीन कालमें एक बार देवता और दानव सब घोर अन्धकारमें एक-दूसरेके साथ युद्ध करते थे। वहाँ राहुने अपने बाणोंसे चन्द्रमा और सूर्यको घायल कर दिया था (इसलिये सब ओर घोर अन्धकार छा गया था) ॥ २ ॥
अथ ते तमसा ग्रस्ता निघ्न्यन्ते स्म दानवैः ।
देवा नृपतिशार्दूल सहैव बलिभिस्तदा ॥ ३ ॥
नृपश्रेष्ठ! फिर तो अन्धकारमें फँसे हुए देवतालोग कुछ सूझ न पड़नेके कारण एक साथ ही बलवान् दानवोंके हाथसे मारे जाने लगे ॥ ३ ॥
असुरैर्वध्यमानास्ते क्षीणप्राणा दिवौकसः ।
अपश्यन्त तपस्यन्तमत्रिं विप्रं तपोधनम् ॥ ४ ॥
अथैनमब्रुवन् देवाः शान्तक्रोधं जितेन्द्रियम् ।
असुरैरिषुभिर्विद्धौ चन्द्रादित्याविमावुभौ ॥ ५ ॥
वयं वध्यामहे चापि शत्रुभिस्तमसावृते ।
नाधिगच्छाम शान्तिं च भयात् त्रायस्व नः प्रभो ॥ ६ ॥
असुरोंकी मार खाकर देवताओंकी प्राणशक्ति क्षीण हो चली और वे भागकर तपस्यामें संलग्न हुए तपोधन विप्रवर अत्रि मुनिके पास गये। वहाँ उन्होंने उन क्रोधशून्य जितेन्द्रिय मुनिका दर्शन किया और इस प्रकार कहा—'प्रभो! असुरोंने अपने बाणोंद्वारा चन्द्रमा और सूर्यको घायल कर दिया है और अब घोर अन्धकार छा जानेके कारण हम भी शत्रुओंके हाथसे मारे जा रहे हैं। हमें तनिक भी शान्ति नहीं मिलती है। आप कृपा करके हमारी रक्षा कीजिये' ॥ ४—६ ॥
अत्रिरुवाच