भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1487, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1487

शृणु राजन् महत्कर्म च्यवनस्य महात्मनः ॥ १५ ॥
उनके ऐसा कहनेपर भी अर्जुन चुप ही रहा। तब वायु देवता फिर कहने लगे—राजन्! अब महात्मा च्यवनके माहात्म्यका वर्णन सुनो ॥ १५ ॥
अश्विनोः प्रतिसंश्रुत्य च्यवनः पाकशासनम् ।
प्रोवाच सहितो देवैः सोमपावश्विनौ कुरु ॥ १६ ॥
पूर्वकालमें च्यवन मुनिने अश्विनीकुमारोंको सोमपान करानेकी प्रतिज्ञा करके इन्द्रसे कहा—'देवराज! आप दोनों अश्विनीकुमारोंको देवताओंके साथ सोमपानमें सम्मिलित कर लीजिये' ॥ १६ ॥

इन्द्र उवाच

अस्माभिर्निन्दितावेतौ भवेतां सोमपौ कथम् ।
देवैर्न सम्मितावेतौ तस्मान्मैवं वदस्व नः ॥ १७ ॥
इन्द्र बोले— विप्रवर! अश्विनीकुमार हमलोगोंके द्वारा निन्दित हैं। फिर ये सोमपानके अधिकारी कैसे हो सकते हैं। ये दोनों देवताओंके समान प्रतिष्ठित नहीं हैं; अतः उनके लिये इस तरहकी बात न कीजिये ॥ १७ ॥
अश्विभ्यां सह नेच्छामः सोमं पातुं महाव्रत ।
यदन्यद् वक्ष्यसे विप्र तत् करिष्यामि ते वचः ॥ १८ ॥
महान् व्रतधारी विप्रवर! हमलोग अश्विनीकुमारोंके साथ सोमपान करना नहीं चाहते हैं। अतः इसको छोड़कर आप और जिस कामके लिये मुझे आज्ञा देंगे, उसे अवश्य मैं पूर्ण करूँगा ॥ १८ ॥

च्यवन उवाच

पिबेतामश्विनौ सोमं भवद्भिः सहिताविमौ ।
उभावेतावपि सुरौ सूर्यपुत्रौ सुरेश्वर ॥ १९ ॥
च्यवन बोले— देवराज! अश्विनीकुमार भी सूर्यके पुत्र होनेके कारण देवता ही हैं। अतः ये आप सब लोगोंके साथ निश्चय ही सोमपान कर सकते हैं ॥ १९ ॥
क्रियतां मद्वचो देवा यथा वै समुदाहृतम् ।
एतद् वः कुर्वतां श्रेयो भवेन्नैतदकुर्वताम् ॥ २० ॥
देवताओ! मैंने जैसी बात कही है, उसे आपलोग स्वीकार करें। ऐसा करनेमें ही आपलोगोंकी भलाई है; अन्यथा इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा ॥ २० ॥

इन्द्र उवाच

अश्विभ्यां सह सोमं वै न पास्यामि द्विजोत्तम ।
पिबन्त्वन्ये यथाकामं नाहं पातुमिहोत्सहे ॥ २१ ॥