महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1489, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसके बाद उन महामुनिने अग्निमें आहुति डालकर इन्द्रके लिये एक अत्यन्त भयंकर शत्रु उत्पन्न किया, जिसका नाम मद था। वह मुँह फैलाकर खड़ा हो गया। उसकी ठोढ़ीका भाग जमीनमें सटा हुआ था और ऊपरवाला ओठ आकाशको छू रहा था। उसके मुँहके भीतर एक हजार दाँत थे, जो सौ-सौ योजन ऊँचे थे और उसकी भयंकर दाढ़ें दो-दो सौ योजन लंबी थीं। उस समय इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता उसकी जिह्वाकी जड़में आ गये, ठीक उसी तरह जैसे महासागरमें बहुत-से मत्स्य तिमि नामक महामत्स्यके मुखमें पड़ गये हों॥ २६—२९॥
ते सम्मन्त्र्य ततो देवा मदस्यास्यसमीपगाः।
अब्रुवन् सहिताः शक्रं प्रणमास्मै द्विजातये॥ ३०॥
अश्विभ्यां सह सोमं च पिबाम विगतज्वराः।
फिर तो मदके मुखमें पड़े हुए देवताओंने आपसमें सलाह करके इन्द्रसे कहा—'देवराज! आप विप्रवर च्यवनको प्रणाम कीजिये (इनसे विरोध करना अच्छा नहीं है)। हमलोग निश्चिन्त होकर अश्विनीकुमारोंके साथ सोमपान करेंगे'॥ ३० १/२॥
ततः स प्रणतः शक्रश्चकार च्यवनस्य तत्॥ ३१॥
च्यवनः कृतवानेतावश्विनौ सोमपायिनौ।
ततः प्रत्याहरत् कर्म मदं च व्यभजन्मुनिः॥ ३२॥
अक्षेषु मृगयायां च पाने स्त्रीषु च वीर्यवान्॥ ३३॥
यह सुनकर इन्द्रने महामुनि च्यवनके चरणोंमें प्रणाम किया और उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। फिर च्यवनने अश्विनीकुमारोंको सोमरसका भागी बनाया और अपना यज्ञ समाप्त कर दिया। इसके बाद शक्तिशाली मुनिने जुआ, शिकार, मदिरा और स्त्रियोंमें मदको बाँट दिया॥ ३१—३३॥
एतैर्दोषैर्नरा राजन् क्षयं यान्ति न संशयः।
तस्मादेतान् नरो नित्यं दूरतः परिवर्जयेत्॥ ३४॥
राजन्! इन दोषोंसे युक्त मनुष्य अवश्य ही नाशको प्राप्त होते हैं, इसमें संशय नहीं है। अतः इन्हें सदाके लिये दूरसे ही त्याग देना चाहिये॥ ३४॥
एतत् ते च्यवनस्यापि कर्म राजन् प्रकीर्तितम्।
ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वं क्षत्रियं ब्राह्मणाद् वरम्॥ ३५॥
नरेश्वर! यह तुमसे च्यवन मुनिका महान् कर्म भी बताया गया। मैं कहता हूँ—ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं अथवा तुम, बताओ कौन-सा क्षत्रिय ब्राह्मणसे श्रेष्ठ है?॥ ३५॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे
षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५६॥