महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1491, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
कप नामक दानवोंके द्वारा स्वर्गलोकपर अधिकार जमा लेनेपर ब्राह्मणोंका कपोंको भस्म कर देना, वायुदेव और कार्तवीर्य अर्जुनके संवादका उपसंहार
भीष्म उवाच
तूष्णीमासीदर्जुनस्तु पवनस्त्वब्रवीत् पुनः ।
शृणु मे ब्राह्मणेष्वेव मुख्यं कर्म जनाधिप ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! इतनेपर भी कार्तवीर्य चुप ही रहा। तब वायु देवताने फिर कहा—नरेश्वर! ब्राह्मणोंके और भी जो श्रेष्ठ कर्म हैं, उनका वर्णन सुनो ॥ १ ॥
मदस्यास्यमनुप्राप्ता यदा सेन्द्रा दिवौकसः ।
तदैव च्यवनेनेह हृता तेषां वसुन्धरा ॥ २ ॥
जब इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता मदके मुखमें पड़ गये थे, उसी समय च्यवनने उनके अधिकारकी सारी भूमि हर ली थी (तथा कप नामक दानवोंने उनके स्वर्गलोकपर अधिकार जमा लिया था) ॥ २ ॥
उभौ लोकौ हृतौ मत्वा ते देवा दुःखिताऽभवन् ।
शोकार्ताश्च महात्मानं ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥ ३ ॥
अपने दोनों लोकोंका अपहरण हुआ जान वे देवता बहुत दुःखी हो गये और शोकसे आतुर हो महात्मा ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ ३ ॥
देवा ऊचुः
मदास्यव्यतिषक्तानामस्माकं लोकपूजित ।
च्यवनेन हृता भूमिः कपैश्चैव दिवं प्रभो ॥ ४ ॥
**देवता बोले—**लोकपूजित प्रभो! जिस समय हम मदके मुखमें पड़ गये थे, उस समय च्यवनने हमारी भूमि हर ली थी और कप नामक दानवोंने स्वर्गलोकपर अधिकार कर लिया ॥ ४ ॥
ब्रह्मोवाच
गच्छध्वं शरणं विप्रानाशु सेन्द्रा दिवौकसः ।
प्रसाद्य तानुभौ लोकाववाप्स्यथ यथा पुरा ॥ ५ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**इन्द्रसहित देवताओ! तुमलोग शीघ्र ही ब्राह्मणोंकी शरणमें जाओ। उन्हें प्रसन्न कर लेनेपर तुमलोग पहलेकी भाँति दोनों लोक प्राप्त कर लोगे ॥ ५ ॥