भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1517, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1517

समुद्र आदिका जल क्षुब्ध हो उठा, पृथ्वी काँपने लगी, पर्वत पिघलने लगे और आकाश सब ओरसे फटने-सा लगा ॥ १५ ॥

अन्धेन तमसा लोकाः प्रावृता न चकाशिरे ।
प्रणष्टा ज्योतिषां भाश्व सह सूर्येण भारत ॥ १६ ॥
समस्त लोक घोर अन्धकारसे आवृत होनेके कारण प्रकाशित नहीं होते थे। भारत! ग्रहों और नक्षत्रोंका प्रकाश सूर्यके साथ ही नष्ट (अदृश्य) हो गया ॥ १६ ॥

भृशं भीतास्ततः शान्तिं चक्रुः स्वस्त्ययनानि च ।
ऋषयः सर्वभूतानामात्मनश्च हितैषिणः ॥ १७ ॥
सम्पूर्ण भूतोंका और अपना भी हित चाहनेवाले ऋषि अत्यन्त भयभीत हो शान्ति एवं स्वस्तिवाचन आदि कर्म करने लगे ॥ १७ ॥

ततः सोऽभ्यद्रवद् देवान् रुद्रो रौद्रपराक्रमः ।
भगस्य नयने क्रुद्धः प्रहारेण व्यशातयत् ॥ १८ ॥
तदनन्तर भयानक पराक्रमी रुद्र देवताओंकी ओर दौड़े। उन्होंने क्रोधपूर्वक प्रहार करके भगदेवताके नेत्र नष्ट कर दिये ॥ १८ ॥

पूषणं चाभिदुद्राव पादेन च रुषान्वितः ।
पुरोडाशं भक्षयतो दशनान् वै व्यशातयत् ॥ १९ ॥
फिर उन्होंने रोषमें भरकर पैदल ही पूषादेवताका पीछा किया और पुरोडाश भक्षण करनेवाले उनके दाँतोंको तोड़ डाला ॥ १९ ॥

ततः प्रणेमुर्देवास्ते वेपमानाः स्म शङ्करम् ।
पुनश्च संदधे रुद्रो दीप्तं सुनिशितं शरम् ॥ २० ॥
तब सब देवता काँपते हुए वहाँ भगवान् शंकरको प्रणाम करने लगे। इधर रुद्रदेवने पुनः एक प्रज्वलित एवं तीखे बाणका संधान किया ॥ २० ॥

रुद्रस्य विक्रमं दृष्ट्वा भीता देवाः सहर्षिभिः ।
ततः प्रसादयामासुः शर्वं ते विबुधोत्तमाः ॥ २१ ॥
रुद्रका पराक्रम देखकर ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवता थर्रा उठे। फिर उन श्रेष्ठ देवताओंने भगवान् शिवको प्रसन्न किया ॥ २१ ॥

जेपुश्च शतरुद्रीयं देवाः कृत्वाञ्जलिं तदा ।
संस्तूयमानस्त्रिदशैः प्रसाद महेश्वरः ॥ २२ ॥
उस समय देवतालोग हाथ जोड़कर शतरुद्रियका जप करने लगे। देवताओंके द्वारा अपनी स्तुति की जानेपर महेश्वर प्रसन्न हो गये ॥ २२ ॥

रुद्रस्य भागं यज्ञे च विशिष्टं ते त्वकल्पयन् ।
भयेन त्रिदशा राजन् शरणं च प्रपेदिरे ॥ २३ ॥