भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1522, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1522

देवानां सुमहान् यच्च यच्चास्य विषयो महान् ।
यच्च विश्वं महत् पाति महादेवस्ततः स्मृतः ॥ ८ ॥
वे देवताओंमें महान् हैं, उनका विषय भी महान् है तथा वे महान् विश्वकी रक्षा करते हैं; इसलिये ‘महादेव’ कहलाते हैं ॥ ८ ॥
धूम्ररूपं च यत्तस्य धूर्जटीत्यत उच्यते ।
समेधयति यन्नित्यं सर्वान् वै सर्वकर्मभिः ॥ ९ ॥
मनुष्यान् शिवमन्विच्छंस्तस्मादेष शिवः स्मृतः ।
अथवा उनकी जटाका रूप धूम्र वर्णका है, इसलिये उन्हें ‘धूर्जटि’ कहते हैं। सब प्रकारके कर्मोंद्वारा सब लोगोंकी उन्नति करते हैं और सबका कल्याण चाहते हैं; इसलिये इनका नाम ‘शिव’ है ॥ ९ ½ ॥
दहत्यूर्ध्वं स्थितो यच्च प्राणान् नॄणां स्थिरश्च यत् ॥ १० ॥
स्थिरलिंगश्च यन्नित्यं तस्मात् स्थाणुरिति स्मृतः ।
ये ऊर्ध्वभागमें स्थित होकर देहधारियोंके प्राणोंका नाश करते हैं। सदा स्थिर रहते हैं और जिनका लिंग-विग्रह सदा स्थिर रहता है। इसलिये ये ‘स्थाणु’ कहलाते हैं ॥ १० ½ ॥
यदस्य बहुधा रूपं भूतं भव्यं भवत्तथा ॥ ११ ॥
स्थावरं जङ्गमं चैव बहुरूपस्ततः स्मृतः ।
विश्वे देवाश्च यत्तस्मिन् विश्वरूपस्ततः स्मृतः ॥ १२ ॥
भूत, भविष्य और वर्तमानकालमें स्थावर और जंगमोंके आकारमें उनके अनेक रूप प्रकट होते हैं, इसलिये वे ‘बहुरूप’ कहे गये हैं। समस्त देवता उनमें निवास करते हैं; इसलिये वे ‘विश्वरूप’ कहे गये हैं ॥ ११-१२ ॥
सहस्राक्षोऽयुताक्षो वा सर्वतोऽक्षिमयोऽपि वा ।
चक्षुषः प्रभवेत् तेजो नास्त्यन्तोऽथास्य चक्षुषाम् ॥ १३ ॥
उनके नेत्रसे तेज प्रकट होता है तथा उनके नेत्रोंका अन्त नहीं है। इसलिये ये ‘सहस्राक्ष’, ‘आयुताक्ष’ और ‘सर्वतोऽक्षिमय’ कहलाते हैं ॥ १३ ॥
सर्वथा यत् पशून् पाति तैश्च यद् रमते सह ।
तेषामधिपतिर्यच्च तस्मात् पशुपतिः स्मृतः ॥ १४ ॥
वे सब प्रकारसे पशुओंका पालन करते हैं, उनके साथ रहनेमें सुख मानते हैं तथा पशुओंके अधिपति हैं। इसलिये वे ‘पशुपति’ कहलाते हैं ॥ १४ ॥
नित्येन ब्रह्मचर्येण लिङ्गमस्य यदा स्थितम् ।
महयत्यस्य लोकश्च प्रियं ह्येतन्महात्मनः ॥ १५ ॥
मनुष्य यदि ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए प्रतिदिन स्थिर शिवलिंगकी पूजा करता है तो इससे महात्मा शंकरको बड़ी प्रसन्नता होती है ॥ १५ ॥
विग्रहं पूजयेद् यो वै लिङ्गं वापि महात्मनः ।