महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1528, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंयदि प्रत्यक्ष, आगम और शिष्टाचार—ये तीनों ही प्रमाण हैं तो इनकी तो पृथक्-पृथक् उपलब्धि हो रही है और धर्म एक है; फिर ये तीनों कैसे धर्म हो सकते हैं? ।। १८ ।।
भीष्म उवाच
धर्मस्य ह्रियमाणस्य बलवद्भिर्दुरात्मभिः ।
यद्येवं मन्यसे राजंस्त्रिधा धर्मविचारणा ।। १९ ।।
भीष्मजीने कहा— राजन्! प्रबल दुरात्माओंद्वारा जिसे हानि पहुँचायी जाती है, उस धर्मका स्वरूप यदि तुम इस तरह प्रमाण-भेदसे तीन प्रकारका मानते हो तो तुम्हारा यह विचार ठीक नहीं है। वास्तवमें धर्म एक ही है, जिसपर तीन प्रकारसे विचार किया जाता है—तीनों प्रमाणोंद्वारा उसकी समीक्षा की जाती है ।। १९ ।।
एक एवेति जानीहि त्रिधा धर्मस्य दर्शनम् ।
पृथक्त्वे च न मे बुद्धिस्त्रयाणामपि वै तथा ।। २० ।।
यह निश्चय समझो कि धर्म एक ही है। तीनों प्रमाणोंद्वारा एक ही धर्मका दर्शन होता है। मैं यह नहीं मानता कि ये तीनों प्रमाण भिन्न-भिन्न धर्मका प्रतिपादन करते हैं ।। २० ।।
उक्तो मार्गस्त्रयाणां च तत्तथैव समाचर ।
जिज्ञासा न तु कर्तव्या धर्मस्य परितर्कणात् ।। २१ ।।
उक्त तीनों प्रमाणोंके द्वारा जो धर्ममय मार्ग बताया गया है, उसीपर चलते रहो। तर्कका सहारा लेकर धर्मकी जिज्ञासा करना कदापि उचित नहीं है ।। २१ ।।
सदैव भरतश्रेष्ठ मा तेऽभूदत्र संशयः ।
अन्धो जड इवाशङ्की यद् ब्रवीमि तदाचर ।। २२ ।।
भरतश्रेष्ठ! मेरी इस बातमें तुम्हें कभी संदेह नहीं होना चाहिये। मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे अन्धों और गूँगोंकी तरह बिना किसी शंकाके मानकर उसके अनुसार आचरण करो ।। २२ ।।
अहिंसा सत्यमक्रोधो दानमेतच्चतुष्टयम् ।
अजातशत्रो सेवस्व धर्म एष सनातनः ।। २३ ।।
अजातशत्रो! अहिंसा, सत्य, अक्रोध और दान—इन चारोंका सदा सेवन करो। यह सनातन धर्म है ।। २३ ।।
ब्राह्मणेषु च वृत्तिर्या पितृपैतामहोचिता ।
तामन्वेहि महाबाहो धर्मस्यैते हि देशिकाः ।। २४ ।।
महाबाहो! तुम्हारे पिता-पितामह आदिने ब्राह्मणोंके साथ जैसा बर्ताव किया है, उसीका तुम भी अनुसरण करो; क्योंकि ब्राह्मण धर्मके उपदेशक हैं ।। २४ ।।
प्रमाणमप्रमाणं वै यः कुर्यादबुधो जनः ।
न स प्रमाणतामर्हो विवादजननो हि सः ।। २५ ।।