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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1548, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1548

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षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

भीष्मकी अनुमति पाकर युधिष्ठिरका सपरिवार हस्तिनापुरको प्रस्थान

जनमेजय उवाच

शरत्तल्पगते भीष्मे कौरवाणां धुरन्धरे ।
शयाने वीरशयने पाण्डवैः समुपस्थिते ॥ १ ॥
युधिष्ठिरो महाप्राज्ञो मम पूर्वपितामहः ।
धर्माणामगमं श्रुत्वा विदित्वा सर्वसंशयान् ॥ २ ॥
दानानां च विधिं श्रुत्वा च्छिन्नधर्मार्थसंशयः ।
यदन्यदकरोद् विप्र तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ ३ ॥

जनमेजयने पूछा— विप्रवर! कुरुकुलके धुरन्धर वीर भीष्मजी जब वीरोंके सोनेयोग्य बाणशय्यापर सो गये और पाण्डवलोग उनकी सेवामें उपस्थित रहने लगे, तब मेरे पूर्व पितामह महाज्ञानी राजा युधिष्ठिरने उनके मुखसे धर्मोंका उपदेश सुनकर अपने समस्त संशयोंका समाधान जान लेनेके पश्चात् दानकी विधि श्रवण करके धर्म और अर्थविषयक सारे संदेह दूर हो जानेपर जो और कोई कार्य किया हो, उसे मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १—३ ॥

वैशम्पायन उवाच

अभून्मुहूर्तं स्तिमितं सर्वं तद्राजमण्डलम् ।
तूष्णींभूते ततस्तस्मिन् पटे चित्रमिवार्पितम् ॥ ४ ॥

वैशम्पायनजीने कहा— जनमेजय! सब धर्मोंका उपदेश करनेके पश्चात् जब भीष्मजी चुप हो गये, तब दो घड़ीतक सारा राजमण्डल पटपर अंकित किये हुए चित्रके समान स्तब्ध-सा हो गया ॥ ४ ॥

मुहूर्तमिव च ध्यात्वा व्यासः सत्यवतीसुतः ।
नृपं शयानं गाङ्गेयमिदमाह वचस्तदा ॥ ५ ॥

तब दो घड़ीतक ध्यान करनेके पश्चात् सत्यवती-नन्दन व्यासने वहाँ सोये हुए गङ्गानन्दन महाराज भीष्मजीसे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥

राजन् प्रकृतिमापन्नः कुरुराजो युधिष्ठिरः ।
सहितो भ्रातृभिः सर्वैः पार्थिवैश्चानुयायिभिः ॥ ६ ॥
उपास्ते त्वां नरव्याघ्र सह कृष्णेन धीमता ।
तमिमं पुरयानाय समनुज्ञातुमर्हसि ॥ ७ ॥

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 1548, कुल 2566 में से · BharatKosha