भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1563, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1563

सुनो। भीष्म राजोचित सदाचारसे सम्पन्न थे। वे उत्तम बुद्धि और श्रेष्ठ कुलसे सम्पन्न थे॥ २१—२३॥ सत्कर्ता कुरुवृद्धानां पितृभक्तो महाव्रतः। जामदग्न्येन रामेण यः पुरा न पराजितः॥ २४॥ दिव्यैरस्त्रैर्महावीर्यः स हतोऽद्य शिखण्डिना। ‘महान् व्रतधारी भीष्म कुरुकुलवृद्ध पुरुषोंके सत्कार करनेवाले और अपने पिताके बड़े भक्त थे। हाय! पूर्वकालमें जमदग्निनन्दन परशुराम भी अपने दिव्य अस्त्रोंद्वारा जिस मेरे महापराक्रमी पुत्रको पराजित न कर सके, वह इस समय शिखण्डीके हाथसे मारा गया। यह कितने कष्टकी बात है॥ २४ १/२॥ अश्मसारमयं नूनं हृदयं मम पार्थिवाः॥ २५॥ अपश्यन्त्याः प्रियं पुत्रं यन्न दीर्यति मेऽद्य वै। ‘राजाओ! अवश्य ही मेरा हृदय पत्थर और लोहेका बना हुआ है, तभी तो अपने प्रिय पुत्रको जीवित न देखकर भी आज यह फट नहीं जाता है॥ २५ १/२॥ समेतं पार्थिवं क्षत्रं काशिपुर्यां स्वयंवरे॥ २६॥ विजित्यैकरथेनैव कन्याश्चायं जहार ह। ‘काशीपुरीके स्वयंवरमें समस्त भूमण्डलके क्षत्रिय एकत्र हुए थे, किंतु भीष्मने एकमात्र रथकी ही सहायतासे उन सबको जीतकर काशिराजकी तीनों कन्याओंका अपहरण किया था॥ २६ १/२॥ यस्य नास्ति बले तुल्यः पृथिव्यामपि कश्चन॥ २७॥ हतं शिखण्डिना श्रुत्वा न विदीर्येत यन्मनः। ‘हाय! इस पृथ्वीपर बलमें जिसकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, उसीको शिखण्डीके हाथसे मारा गया सुनकर आज मेरी छाती क्यों नहीं फट जाती॥ २७ १/२॥ जामदग्न्यः कुरुक्षेत्रे युधि येन महात्मना॥ २८॥ पीडितो नातियत्नेन स हतोऽद्य शिखण्डिना। ‘जिस महामना वीरने जमदग्निनन्दन परशुरामको कुरुक्षेत्रके युद्धमें अनायास ही पीड़ित कर दिया था, वही शिखण्डीके हाथसे मारा गया, यह कितने दुःखकी बात है’॥ २८ १/२॥ एवंविधं बहु तदा विलपन्तीं महानदीम्॥ २९॥ आश्वासयामास तदा गङ्गां दामोदरो विभुः।