महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1565, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंऐसी बातें कहकर जब महानदी गंगाजी बहुत विलाप करने लगीं, तब भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा— ।। २९ १/२ ।। समाश्र्वसिहि भद्रे त्वं मा शुचः शुभदर्शने ।। ३० ।। गतः स परमं लोकं तव पुत्रो न संशयः । ‘भद्रे! धैर्य धारण करो। शुभदर्शने! शोक न करो। तुम्हारे पुत्र भीष्म अत्यन्त उत्तम लोकमें गये हैं, इसमें संशय नहीं है ।। ३० १/२ ।। वसुरेष महातेजाः शापदोषेण शोभने ।। ३१ ।। मानुषत्वमनुप्राप्तो नैनं शोचितुमर्हसि । ‘शोभने! ये महातेजस्वी वसु थे, वसिष्ठजीके शाप-दोषसे इन्हें मनुष्य-योनिमें आना पड़ा था। अतः इनके लिये शोक नहीं करना चाहिये ।। ३१ १/२ ।। स एष क्षत्रधर्मेण अयुध्यत रणाजिरे ।। ३२ ।। धनंजयेन निहतो नैष देवि शिखण्डिना । ‘देवि! इन्होंने समरांगणमें क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध किया था। ये अर्जुनके हाथसे मारे गये हैं, शिखण्डीके हाथसे नहीं ।। ३२ १/२ ।। भीष्मं हि कुरुशार्दूलमुद्यतेषुं महारणे ।। ३३ ।। न शक्तः संयुगे हन्तुं साक्षादपि शतक्रतुः । स्वच्छन्दतस्तव सुतो गतः स्वर्गं शुभानने ।। ३४ ।। ‘शुभानने! तुम्हारे पुत्र कुरुश्रेष्ठ भीष्म जब हाथमें धनुष-बाण लिये रहते, उस समय साक्षात् इन्द्र भी उन्हें युद्धमें मार नहीं सकते थे। ये तो अपनी इच्छासे ही शरीर त्यागकर स्वर्गलोकमें गये हैं ।। ३३-३४ ।। न शक्ता विनिहन्तुं हि रणे तं सर्वदेवताः । तस्मान्मा त्वं सरिच्छ्रेष्ठे शोचस्व कुरुनन्दनम् । वसूनेष गतो देवि पुत्रस्ते विज्वरा भव ।। ३५ ।। ‘सरिताओंमें श्रेष्ठ देवि! सम्पूर्ण देवता मिलकर भी युद्धमें उन्हें मारनेकी शक्ति नहीं रखते थे। इसलिये तुम कुरुनन्दन भीष्मजीके लिये शोक मत करो। ये तुम्हारे पुत्र भीष्म वसुओंके स्वरूपको प्राप्त हुए हैं। अतः इनके लिये चिन्तारहित हो जाओ’ ।। ३५ ।। वैशम्पायन उवाच इत्युक्ता सा तु कृष्णेन व्यासेन तु सरिद्वरा । त्यक्त्वा शोकं महाराज स्वं वार्यवततार ह ।। ३६ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज! जब भगवान् श्रीकृष्ण और व्यासजीने इस प्रकार समझाया, तब नदियोंमें श्रेष्ठ गंगाजी शोक त्यागकर अपने जलमें उतर गयीं ।। ३६ ।। सत्कृत्य ते तां सरितं ततः कृष्णमुखा नृप ।