भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1572, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1572

'इस युद्धमें वीरोचित सुयशसे युक्त हुआ सारा क्षत्रियसमुदाय स्वर्गलोक पानेका अधिकारी है, क्योंकि इन शूरवीरोंमेंसे कोई भी युद्धमें पीठ दिखाकर नहीं मारा गया है ॥ ७ ॥ त्यज शोकं महाराज भवितव्यं हि तत्तथा । न शक्यास्ते पुनर्दृष्टुं त्वया येऽस्मिन् रणे हताः ॥ ८ ॥ 'महाराज! शोक त्याग दीजिये, क्योंकि जो कुछ हुआ है, वैसी ही होनहार थी। इस युद्धमें जो लोग मारे गये हैं, उन्हें आप फिर नहीं देख सकते' ॥ ८ ॥ एतावदुक्त्वा गोविन्दो धर्मराजं युधिष्ठिरम् । विरराम महातेजास्तमुवाच युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर महातेजस्वी भगवान् श्रीकृष्ण चुप हो गये। तब युधिष्ठिरने उनसे कहा ॥ ९ ॥ युधिष्ठिर उवाच गोविन्द मयि या प्रीतिस्तव सा विदिता मम । सौहृदेन तथा प्रेम्णा सदा मय्यनुकम्पसे ॥ १० ॥ युधिष्ठिर बोले—गोविन्द! आपका जो मेरे ऊपर प्रेम है, वह मुझे अच्छी तरह ज्ञात है। आप स्नेह और सौहार्दवश सदा ही मुझपर कृपा करते रहते हैं ॥ १० ॥ प्रियं तु मे स्यात् सुमहत्कृतं चक्रगदाधर । श्रीमन् प्रीतेन मनसा सर्वं यादवन्दन ॥ ११ ॥ यदि मामनुजानीयाद् भवान् गन्तुं तपोवनम् । (कृतकृत्यो भविष्यामि इति मे निश्चिता मतिः ।) चक्र और गदा धारण करनेवाले श्रीमान् यादवनन्दन! यदि आप प्रसन्न मनसे मुझे तपोवनमें जानेकी आज्ञा दे दें तो मेरा सारा और महान् प्रिय कार्य सम्पन्न हो जाय। उस दशामें मैं कृतकार्य हो जाऊँगा, यह मेरा निश्चित विचार है ॥ ११ १/२ ॥ न हि शान्तिं प्रपश्यामि पातयित्वा पितामहम् ॥ १२ ॥ (नृशंसः पुरुषव्याघ्रं गुरुं वीर्यबलान्वितम् ।) कर्णं च पुरुषव्याघ्रं संग्रामेष्वपलायिनम् । मैं क्रूरतापूर्वक पितामह भीष्मको, बल-पराक्रमसे सम्पन्न पुरुषसिंह गुरुदेव द्रोणाचार्यको और युद्धसे कभी पीठ न दिखानेवाले नरश्रेष्ठ कर्णको मरवाकर कभी शान्ति नहीं पा सकता ॥ १२ १/२ ॥ कर्मणा येन मुच्येयमस्मात् क्रूरादरिंदम ॥ १३ ॥ कर्मणा तद् विधत्स्वेह येन शुध्यति मे मनः ।