महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1585, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंवासवोऽपि मरुत्तेन स्पर्धते पाण्डुनन्दन ।। १५ ।।
पाण्डुनन्दन! राजा मरुत्त सदा देवराज इन्द्रसे स्पर्धा रखते थे और इन्द्र भी मरुत्तके साथ स्पर्धा रखते थे ।। १५ ।।
शुचिः स गुणवानासीन्मरुत्तः पृथिवीपतिः ।
यतमानोऽपि यं शक्रो न विशेषयति स्म ह ।। १६ ।।
पृथिवीपति मरुत्त पवित्र एवं गुणवान् थे। इन्द्र उनसे बढ़नेके लिये सदा प्रयत्न करते थे तो भी कभी बढ़ नहीं पाते थे ।। १६ ।।
सोऽशक्नुवन् विशेषाय समाहूय बृहस्पतिम् ।
उवाचेदं वचो देवैः सहितो हरिवाहनः ।। १७ ।।
जब देवताओंसहित इन्द्र किसी तरह बढ़ न सके, तब बृहस्पतिको बुलाकर उनसे इस प्रकार कहने लगे— ।। १७ ।।
बृहस्पते मरुत्तस्य मा स्म कार्षीः कथंचन ।
दैवं कर्मार्थ पित्र्यं वा कर्तासि मम चेत् प्रियम् ।। १८ ।।
‘बृहस्पतिजी! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो राजा मरुत्तका यज्ञ तथा श्राद्धकर्म किसी तरह न कराइयेगा ।। १८ ।।
अहं हि त्रिषु लोकेषु सुराणां च बृहस्पते ।
इन्द्रत्वं प्राप्तवानेको मरुत्तस्तु महीपतिः ।। १९ ।।
‘बृहस्पते! एकमात्र मैं ही तीनों लोकोंका स्वामी और देवताओंका इन्द्र हूँ। मरुत्त तो केवल पृथ्वीके राजा हैं ।। १९ ।।
कथं ह्यमर्त्यं ब्रह्मंस्त्वं याजयित्वा सुराधिपम् ।
याजयेर्मृत्युसंयुक्तं मरुत्तमविशङ्कया ।। २० ।।
‘ब्रह्मन्! आप अमर देवराजका यज्ञ कराकर—देवेन्द्रके पुरोहित होकर मरणधर्मा मरुत्तका यज्ञ कैसे निःशंक होकर कराइयेगा? ।। २० ।।
मां वा वृणीष्व भद्रं ते मरुत्तं वा महीपतिम् ।
परित्यज्य मरुत्तं वा यथाजोषं भजस्व माम् ।। २१ ।।
‘आपका कल्याण हो। आप मुझे अपना यजमान बनाइये अथवा पृथिवीपति मरुत्तको। या तो मुझे छोड़िये या मरुत्तको छोड़कर चुपचाप मेरा आश्रय लीजिये’ ।। २१ ।।
एवमुक्तः स कौरव्य देवराज्ञा बृहस्पतिः ।
मुहूर्तमिव संचिन्त्य देवराजानमब्रवीत् ।। २२ ।।
कुरुनन्दन! देवराज इन्द्रके ऐसा कहनेपर बृहस्पतिने दो घड़ीतक सोच-विचारकर उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया— ।। २२ ।।
त्वं भूतानामधिपतिस्त्वयि लोकाः प्रतिष्ठिताः ।
नमुचेर्विश्वरूपस्य निहन्ता त्वं बलस्य च ।। २३ ।।