भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1589, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1589

'राजन्! नृपश्रेष्ठ! यदि मेरे सुनने योग्य हो तो बताओ। नरेश्वर! मैं पूर्ण यत्न करके तुम्हारा दुःख दूर करूँगा' ।। १३ ।। एवमुक्तो मरुत्तः स नारदेन महर्षिणा । विप्रलम्भमुपाध्यायात् सर्वमेव न्यवेदयत् ।। १४ ।। महर्षि नारदके ऐसा कहनेपर राजा मरुत्तने उपाध्याय (पुरोहित)-से बिछोह होनेका सारा समाचार उन्हें कह सुनाया ।। १४ ।।

मरुत्त उवाच गतोऽस्म्यङ्गिरसः पुत्रं देवाचार्यं बृहस्पतिम् । यज्ञार्थमृत्विजं द्रष्टुं स च मां नाभ्यनन्दत ।। १५ ।। मरुत्तने कहा—नारदजी! मैं अंगिराके पुत्र देवगुरु बृहस्पतिके पास गया था। मेरी यात्राका उद्देश्य यह था कि उन्हें अपना यज्ञ करानेके लिये ऋत्विज्के रूपमें देखूँ; किंतु उन्होंने मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की ।। १५ ।। प्रत्याख्यातश्च तेनाहं जीवितुं नाद्य कामये । परित्यक्तश्च गुरुणा दूषितश्चास्मि नारद ।। १६ ।। नारदजी! मेरे गुरुने मुझपर मरणधर्मा मनुष्य होनेका दोष लगाकर मुझे त्याग दिया। उनके द्वारा इस प्रकार अस्वीकार किये जानेके कारण अब मैं जीवित रहना नहीं चाहता ।। १६ ।।

व्यास उवाच एवमुक्तस्तु राज्ञा स नारदः प्रत्युवाच ह । आविक्षितं महाराज वाचा संजीवयन्निव ।। १७ ।। व्यासजी कहते हैं—महाराज! राजा मरुत्तके ऐसा कहनेपर देवर्षि नारदने अपनी अमृतमयी वाणीके द्वारा अविक्षित्कुमारको जीवन प्रदान करते हुए-से कहा ।। १७ ।।

नारद उवाच राजन्नङ्गिरसः पुत्रः संवर्तो नाम धार्मिकः । चङ्क्रमीति दिशः सर्वा दिग्वासा मोहयन् प्रजाः ।। १८ ।। तं गच्छ यदि याज्यं त्वां न वाञ्छति बृहस्पतिः । प्रसन्नस्त्वां महातेजाः संवर्तो याजयिष्यति ।। १९ ।। नारदजी बोले—राजन्! अंगिराके दूसरे पुत्र संवर्त बड़े धार्मिक हैं। वे दिगम्बर होकर प्रजाको मोहमें डालते हुए अर्थात् सबसे छिपे रहकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते रहते हैं। यदि बृहस्पति तुम्हें अपना यजमान बनाना नहीं चाहते तो तुम संवर्तके ही पास चले जाओ। संवर्त बड़े तेजस्वी हैं, वे प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारा यज्ञ करा देंगे ।। १८-१९ ।।