भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1593, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1593

तं पृष्ठतोऽनुगच्छेथा यत्र गच्छेत् स वीर्यवान् । तनेकान्ते समासाद्य प्राञ्जलिः शरणं व्रजेः ॥ २४ ॥ तुम उस पुरीके प्रवेश-द्वारपर पहुँचकर वहाँ कहींसे एक मुर्दा लाकर रख देना। पृथ्वीनाथ! जो उस मुर्देको देखकर सहसा पीछेकी ओर लौट पड़े, उसे ही संवर्त समझना और वे शक्तिशाली मुनि जहाँ कहीं जायँ उनके पीछे-पीछे चले जाना। जब वे किसी एकान्त स्थानमें पहुचें, तब हाथ जोड़कर शरणापन्न हो जाना ॥ २३-२४ ॥

पृच्छेत् त्वां यदि केनाहं तवाख्यात इति स्म ह । ब्रूयास्त्वं नारदेनेति संवर्त कथितोऽसि मे ॥ २५ ॥ यदि तुमसे पूछें कि किसने तुम्हें मेरा पता बताया है तो कह देना—'संवर्तजी! नारदजीने मुझे आपका पता बताया है' ॥ २५ ॥

स चेत् त्वामनुयुञ्जीत ममानुगमनेप्सया । शंसेथा वह्निमारूढं मामपि त्वमशङ्कया ॥ २६ ॥ यदि वे तुमसे मेरे पास आनेके लिये मेरा पता पूछें तो तुम निर्भीक होकर कह देना कि 'नारदजी आगमें समा गये' ॥ २६ ॥

व्यास उवाच

स तथेति प्रतिश्रुत्य पूजयित्वा च नारदम् । अभ्यनुज्ञाय राजर्षिर्ययौ वाराणसीं पुरीम् ॥ २७ ॥ **व्यासजी कहते हैं—**राजन्! यह सुनकर राजर्षि मरुत्तने 'बहुत अच्छा' कहकर नारदजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और उनसे जानेकी आज्ञा ले वे वाराणसीपुरीकी ओर चल दिये ॥ २७ ॥

तत्र गत्वा यथोक्तं स पुर्या द्वारे महायशाः । कुणपं स्थापयामास नारदस्य वचः स्मरन् ॥ २८ ॥ वहाँ जाकर नारदजीके कथनका स्मरण करते हुए महायशस्वी नरेशने उनके बताये अनुसार काशीपुरीके द्वारपर एक मुर्दा लाकर रख दिया ॥ २८ ॥

यौगपद्येन विप्रश्च पुरीद्वारमथाविशत् । ततः स कुणपं दृष्ट्वा सहसा संन्यवर्तत ॥ २९ ॥ इसी समय विप्रवर संवर्त भी पुरीके द्वारपर आये; किंतु उस मुर्देको देखकर वे सहसा पीछेकी ओर लौट पड़े ॥ २९ ॥

स तं निवृत्तमालक्ष्य प्राञ्जलिः पृष्ठतोऽन्वगात् । आविक्षितो महीपालः संवर्तमुपशिक्षितुम् ॥ ३० ॥ उन्हें लौटा देख राजा मरुत्त संवर्तसे शिक्षा लेनेके लिये हाथ जोड़े उनके पीछे-पीछे गये ॥ ३० ॥