महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1605, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवं कृत्वा नमस्तस्मै महादेवाय रंहसे । महात्मने क्षितिपते तत्सुवर्णमवाप्स्यसि ॥ ३३ ॥ पृथ्वीनाथ! इस प्रकार वेगशाली महात्मा महादेवजीको नमस्कार करके तुम वह सुवर्ण-राशि प्राप्त कर लोगे ॥ ३३ ॥ (लभन्ते गाणपत्यं च तदेकाग्रा हि मानवाः । किं पुनः स्वर्णभाण्डानि तस्मात् त्वं गच्छ मा चिरम् ॥ महत्तरं हि ते लाभं हस्त्यश्वोष्ट्रादिभिः सह ।) जो लोग भगवान् शंकरमें अपने मनको एकाग्र करते हैं, वे तो गणपति-पदको भी प्राप्त कर लेते हैं, फिर सुवर्णमय पात्र पा लेना कौन बड़ी बात है। अतः तुम शीघ्र वहाँ जाओ, विलम्ब न करो। हाथी, घोड़े और ऊँट आदिके साथ तुम्हें वहाँ महान् लाभ प्राप्त होगा ।। सुवर्णमाहरिष्यन्तस्तत्र गच्छन्तु ते नराः । इत्युक्तः स वचस्तेन चक्रे कारन्धमात्मजः ॥ ३४ ॥ तुम्हारे सेवकलोग सुवर्ण लानेके लिये वहाँ जायँ। उनके ऐसा कहनेपर करन्धमके पौत्र मरुत्तने वैसा ही किया ॥ ३४ ॥ (गङ्गाधरं नमस्कृत्य लब्धवान् धनमुत्तमम् । कुबेर इव तत् प्राप्य महादेवप्रसादतः ॥ शालाश्च सर्वसम्भारस्ततः संवर्तशासनात् ।) उन्होंने गंगाधर महादेवजीको नमस्कार करके उनकी कृपासे कुबेरकी भाँति उत्तम धन प्राप्त कर लिया। उस धनको पाकर संवर्तकी आज्ञासे उन्होंने यज्ञशालाओं तथा अन्य सब सम्भारोंका आयोजन किया ॥ ततोऽतिमानुषं सर्वं चक्रे यज्ञस्य संविधिम् । सौवर्णानि च भाण्डानि संचक्रुस्तत्र शिल्पिनः ॥ ३५ ॥ तदनन्तर राजाने अलौकिकरूपसे यज्ञकी सारी तैयारी आरम्भ की। उनके कारीगरोंने वहाँ रहकर सोनेके बहुत-से पात्र तैयार किये ॥ ३५ ॥ बृहस्पतिस्तु तां श्रुत्वा मरुत्तस्य महीपतेः । समृद्धिमतिदेवेभ्यः संतापमकरोद् भृशम् ॥ ३६ ॥ उधर बृहस्पतिने जब सुना कि राजा मरुत्तको देवताओंसे भी बढ़कर सम्पत्ति प्राप्त हुई है, तब उन्हें बड़ा दुःख हुआ ॥ ३६ ॥ स तप्यमानो वैवर्ण्यं कृशत्वं चागमत् परम् । भविष्यति हि मे शत्रुः संवर्तो वसुमानिति ॥ ३७ ॥ वे चिन्ताके मारे पीले पड़ गये और यह सोचकर कि 'मेरा शत्रु संवर्त बहुत धनी हो जायगा' उनका शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया ॥ ३७ ॥ तं श्रुत्वा भृशसंतप्तं देवराजो बृहस्पतिम् ।