भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1607, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1607

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नवमोऽध्यायः

बृहस्पतिका इन्द्रसे अपनी चिन्ताका कारण बताना, इन्द्रकी आज्ञासे अग्निदेवका मरुत्तके पास उनका संदेश लेकर जाना और संवर्तके भयसे पुनः लौटकर इन्द्रसे ब्रह्मबलकी श्रेष्ठता बताना

इन्द्र उवाच

कच्चित्सुखं स्वपिषि त्वं बृहस्पते
कच्चिन्मनोज्ञाः परिचारकास्ते ।
कच्चिद्देवानां सुखकामोऽसि विप्र
कच्चिद्देवास्तां परिपालयन्ति ॥ १ ॥

इन्द्रने कहा— बृहस्पते! आप सुखसे सोते हैं न? आपको मनके अनुकूल सेवक प्राप्त हैं न? विप्रवर! आप देवताओंके सुखकी कामना तो रखते हैं न? क्या देवता आपका पूर्णरूपसे पालन करते हैं? ॥ १ ॥

बृहस्पतिरुवाच

सुखं शये शयने देवराज
तथा मनोज्ञाः परिचारका मे ।
तथा देवानां सुखकामोऽस्मि नित्यं
देवाश्च मां सुभृशं पालयन्ति ॥ २ ॥

बृहस्पतिजी बोले— देवराज! मैं सुखसे शय्यापर सोता हूँ, मुझे मेरे मनके अनुकूल सेवक प्राप्त हुए हैं। मैं सदा देवताओंके सुखकी कामना करता हूँ और देवतालोग भी मेरा भलीभाँति पालन करते हैं ॥ २ ॥

इन्द्र उवाच

कुतो दुःखं मानसं देहजं वा
पाण्डुर्विवर्णश्च कुतस्त्वमद्य ।
आचक्ष्व मे ब्राह्मण यावदेतान्
निहन्मि सर्वांस्तव दुःखकर्तॄन् ॥ ३ ॥

इन्द्रने कहा— विप्रवर! आपको यह मानसिक अथवा शारीरिक दुःख कैसे प्राप्त हुआ? आप आज उदास और पीले क्यों हो रहे हैं? आप बताइये तो सही, जिन्होंने आपको दुःख दिया है, उन सबको मैं अभी नष्ट किये देता हूँ ॥ ३ ॥