भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1625, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1625

'राजेन्द्र! अग्निके लिये लाल रंगकी वस्तुएँ प्रस्तुत की जायें, विश्वेदेवोंके लिये अनेक रूप-रंगवाले पदार्थ दिये जायें, श्रेष्ठ ब्राह्मण यहाँ छूकर दिये गये चंचल शिश्नवाले नील रंगके वृषभका दान ग्रहण करें'। । ३० ।। ततो यज्ञो ववृधे तस्य राजन् यत्र देवाः स्वयमन्नानि जह्रुः । यस्मिन् शक्रो ब्राह्मणैः पूज्यमानः सदस्योऽभूद्धरिमान् देवराजः ।। ३१ ।। नरेश्वर! तदनन्तर राजा मरुत्तके यज्ञका कार्य आगे बढ़ा, जिसमें देवतालोग स्वयं ही अन्न परोसने लगे। ब्राह्मणोंद्वारा पूजित, उत्तम अश्वोंसे युक्त देवराज इन्द्र उस यज्ञमण्डपमें सदस्य बनकर बैठे थे ।। ३१ ।। ततः संवर्तश्चैत्यगतो महात्मा यथा वह्निः प्रज्वलितो द्वितीयः । हवींष्युच्चैराह्वयन् देवसंघान् जुहावाग्नौ मन्त्रवत् सुप्रीतः ।। ३२ ।। इसके बाद द्वितीय अग्निके समान तेजस्वी एवं यज्ञमण्डपमें बैठे हुए महात्मा संवर्तने अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर देववृन्दका उच्चस्वरसे आह्वान करते हुए मन्त्रपाठपूर्वक अग्निमें हविष्यका हवन किया ।। ३२ ।। ततः पीत्वा बलभित् सोममग्र्यं ये चाप्यन्ये सोमपा देवसंघाः । सर्वेऽनुज्ञाताः प्रययुः पार्थिवेन यथाजोषं तर्पिताः प्रीतिमन्तः ।। ३३ ।। तत्पश्चात् इन्द्र तथा सोमपानके अधिकारी अन्य देवताओंने उत्तम सोमरसका पान किया। इससे सबको तृप्ति एवं प्रसन्नता हुई। फिर सब देवता राजा मरुत्तकी अनुमति लेकर अपने-अपने स्थानको चले गये ।। ३३ ।। ततो राजा जातरूपस्य राशीन् पदे पदे कारयामास हृष्टः । द्विजातिभ्यो विसृजन् भूरि वित्तं रराज वित्तेश इवारिहन्ता ।। ३४ ।। तदनन्तर शत्रुहन्ता राजा मरुत्तने बड़े हर्षके साथ वहाँ ब्राह्मणोंको बहुत-से धनका दान करते हुए उनके लिये पग-पगपर सुवर्णके ढेर लगवा दिये। उस समय धनाध्यक्ष कुबेरके समान उनकी शोभा हो रही थी ।। ३४ ।। ततो वित्तं विविधं संनिधाय यथोत्साहं कारयित्वा च कोषम् ।