महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1632, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंस त्वं न दुःखी दुःखस्य न सुखी सुसुखस्य च । स्मर्तुमिच्छसि कौन्तेय किमन्यद् दुःखविभ्रमात् ॥ ७ ॥ कुन्तीनन्दन ! आप न तो दुखी होकर दुःखकी और न सुखी होकर उत्तम सुखकी याद करना चाहते हैं। यह दुःखविभ्रमके सिवा और क्या है ॥ ७ ॥
अथवा ते स्वभावोऽयं येन पार्थावकृष्यसे । दृष्ट्वा सभागतां कृष्णामेकवस्त्रां रजस्वलाम् । मिषतां पाण्डवेयानां न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥ ८ ॥ अथवा पार्थ! आपका यह स्वभाव ही है, जिससे आप आकृष्ट होते हैं। पाण्डवोंके देखते-देखते एकवस्त्रधारिणी रजस्वला कृष्णा सभामें घसीट लायी गयी। आप उसे उस अवस्थामें देखकर भी अब उसकी याद करना नहीं चाहते ॥ ८ ॥
प्रव्राजनं च नगरादजिनैश्च विवासनम् । महारण्यनिवासश्च न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥ ९ ॥ आपलोगोंको नगरसे निकाला गया, मृगछाला पहनाकर वनवास दिया गया और बड़े-बड़े घोर जंगलोंमें रहना पड़ा। इन सब बातोंको आप कभी याद करना नहीं चाहते हैं ॥ ९ ॥
जटासुरात् परिक्लेशश्चित्रसेनेन चाहवः । सैन्धवाच्च परिक्लेशो न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥ १० ॥ जटासुरसे जो क्लेश उठाना पड़ा, चित्रसेनके साथ जूझना पड़ा और सिन्धुराज जयद्रथसे जो अपमान और कष्ट प्राप्त हुआ, उसका स्मरण करनेकी इच्छा आपको नहीं होती है ॥ १० ॥
पुनरज्ञातचर्यायां कीचकेन पदा वधः । याज्ञसेन्यास्तथा पार्थ न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥ ११ ॥ पार्थ! अज्ञातवासके दिनों कीचकने जो द्रौपदीको लात मारी थी, उसे भी आप नहीं याद करना चाहते हैं ॥
यच्च ते द्रोणभीष्माभ्यां युद्धमासीदरिंदम । मनसैकेन योद्धव्यं तत् ते युद्धमुपस्थितम् ॥ १२ ॥ शत्रुदमन! द्रोणाचार्य और भीष्मके साथ जो युद्ध हुआ था, वही युद्ध आपके सामने उपस्थित है। इस समय आपको अकेले अपने मनके साथ युद्ध करना होगा ॥
तस्मादभ्युपगन्तव्यं युद्धाय भरतर्षभ । परमव्यक्तरूपस्य पारं युक्त्या स्वकर्मभिः ॥ १३ ॥ भरतभूषण! अतः उस युद्धके लिये आपको तैयार हो जाना चाहिये। अपने कर्तव्यका पालन करते हुए योगके द्वारा मनको वशीभूत करके आप मायासे परे परब्रह्मको प्राप्त कीजिये ॥ १३ ॥