महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1654, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्राचीन समयमें काश्यप नामके एक धर्मज्ञ और तपस्वी ब्राह्मण किसी सिद्ध महर्षिके पास गये; जो धर्मके विषयमें शास्त्रके सम्पूर्ण रहस्योंको जाननेवाले, भूत और भविष्यके ज्ञान-विज्ञानमें प्रवीण, लोक-तत्त्वके ज्ञानमें कुशल, सुख-दुःखके रहस्यको समझनेवाले, जन्म-मृत्युके तत्त्वज्ञ, पाप-पुण्यके ज्ञाता और ऊँच-नीच प्राणियोंको कर्मानुसार प्राप्त होनेवाली गतिके प्रत्यक्ष द्रष्टा थे ॥ १९—२१ ॥
चरन्तं मुक्तवत्सिद्धं प्रशान्तं संयतेन्द्रियम् । दीप्यमानं श्रिया ब्राह्म्या क्रममाणं च सर्वशः ॥ २२ ॥ अन्तर्धानगतिज्ञं च श्रुत्वा तत्त्वेन काश्यपः । तथैवान्तर्हितैः सिद्धैर्यन्तं चक्रधरैः सह ॥ २३ ॥ सम्भाषमाणमेकान्ते समासीनं च तैः सह । यदृच्छया च गच्छन्तमसक्तं पवनं यथा ॥ २४ ॥
वे मुक्तकी भाँति विचरनेवाले, सिद्ध, शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान, सर्वत्र घूमनेवाले और अन्तर्धान विद्याके ज्ञाता थे। अदृश्य रहनेवाले चक्रधारी सिद्धोंके साथ वे विचरते, बातचीत करते और उन्हींके साथ एकान्तमें बैठते थे। जैसे वायु कहीं आसक्त न होकर सर्वत्र प्रवाहित होती है, उसी तरह वे सर्वत्र अनासक्त भावसे स्वच्छन्दतापूर्वक विचरा करते थे। महर्षि काश्यप उनकी उपर्युक्त महिमा सुनकर ही उनके पास गये थे ॥ २२—२४ ॥
तं समासाद्य मेधावी स तदा द्विजसत्तमः । चरणौ धर्मकामोऽस्य तपस्वी सुसमाहितः । प्रतिपेदे यथान्यायं दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् ॥ २५ ॥ विस्मितश्चाद्भुतं दृष्ट्वा काश्यपस्तद् द्विजोत्तमम् । परिचारेण महता गुरुं तं पर्यतोषयत् ॥ २६ ॥ उपपन्नं च तत्सर्वं श्रुतचारित्रसंयुक्तम् । भावेनातोषयच्चैनं गुरुवृत्त्या परंतपः ॥ २७ ॥
निकट जाकर उन मेधावी, तपस्वी, धर्माभिलाषी और एकाग्रचित्त महर्षिने न्यायानुसार उन सिद्ध महात्माके चरणोंमें प्रणाम किया। वे ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ और बड़े अद्भुत संत थे। उनमें सब प्रकारकी योग्यता थी। वे शास्त्रके ज्ञाता और सच्चरित्र थे। उनका दर्शन करके काश्यपको बड़ा विस्मय हुआ। वे उन्हें गुरु मानकर उनकी सेवामें लग गये और अपनी शुश्रूषा, गुरुभक्ति तथा श्रद्धाभावके द्वारा उन्होंने उन सिद्ध महात्माको संतुष्ट कर लिया ॥ २५—२७ ॥
तस्मै तुष्टः स शिष्याय प्रसन्नो वाक्यमब्रवीत् । सिद्धिं परामभिप्रेक्ष्य शृणु मत्तो जनार्दन ॥ २८ ॥