भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1660, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1660

अपि वोद्वन्धनादीनि परीतानि व्यवस्यति ॥ १३ ॥ उन दोषोंके कुपित होनेसे वह अपने लिये प्राणनाशक रोगोंको बुला लेता है। अथवा फाँसी लगाने या जलमें डूबने आदि शास्त्रविरुद्ध उपायोंका आश्रय लेता है ॥ १३ ॥

तस्य तैः कारणैर्जन्तोः शरीरं च्यवते तदा । जीवितं प्रोच्यमानं तद् यथावदुपधारय ॥ १४ ॥ इन्हीं सब कारणोंसे जीवका शरीर नष्ट हो जाता है। इस प्रकार जो जीवका जीवन बताया जाता है, उसे अच्छी तरह समझ लो ॥ १४ ॥

ऊष्मा प्रकुपितः काये तीव्रवायुसमीरितः । शरीरमनुपर्येत्य सर्वान् प्राणान् रुणद्धि वै ॥ १५ ॥ शरीरमें तीव्र वायुसे प्रेरित हो पित्तका प्रकोप बढ़ जाता है और वह शरीरमें फैलकर समस्त प्राणोंकी गतिको रोक देता है ॥ १५ ॥

अत्यर्थं बलवानूष्मा शरीरे परिकोपितः । भिनत्ति जीवस्थानानि मर्माणि विद्धि तत्त्वतः ॥ १६ ॥ इस शरीरमें कुपित होकर अत्यन्त प्रबल हुआ पित्त जीवके मर्मस्थानोंको विदीर्ण कर देता है। इस बातको ठीक समझो ॥ १६ ॥

ततः सवेदनः सद्यो जीवः प्रच्यवते क्षरात् । शरीरं त्यजते जन्तुश्छिद्यमानेषु मर्मसु ॥ १७ ॥ जब मर्मस्थान छिन्न-भिन्न होने लगते हैं, तब वेदनासे व्यथित हुआ जीव तत्काल इस जड शरीरसे निकल जाता है। उस शरीरको सदाके लिये त्याग देता है ॥ १७ ॥

वेदनाभिः परीतात्मा तद् विद्धि द्विजसत्तम । जातीमरणसंविग्नाः सततं सर्वजन्तवः ॥ १८ ॥ द्विजश्रेष्ठ! मृत्युकालमें जीवका तन-मन वेदनासे व्यथित होता है, इस बातको भलीभाँति जान लो। इस तरह संसारके सभी प्राणी सदा जन्म और मरणसे उद्विग्न रहते हैं ॥ १८ ॥

दृश्यन्ते संत्यजन्तश्च शरीराणि द्विजर्षभ । गर्भसंक्रमणे चापि मर्मणामतिसर्पणे ॥ १९ ॥ तादृशीमेव लभते वेदनां मानवः पुनः । भिन्नसंधिरथ क्लेदमद्भिः स लभते नरः ॥ २० ॥ विप्रवर! सभी जीव अपने शरीरोंका त्याग करते देखे जाते हैं। गर्भमें मनुष्य प्रवेश करते समय तथा गर्भसे नीचे गिरते समय भी वैसी ही वेदनाका अनुभव करता है। मृत्यु-कालमें जीवोंके शरीरकी सन्धियाँ टूटने लगती हैं और जन्मके समय वह गर्भस्थ जलसे भीगकर अत्यन्त व्याकुल हो उठता है ॥ १९-२० ॥

यथा पञ्चसु भूतेषु सम्भूतत्वं नियच्छति ।

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 1660, कुल 2566 में से · BharatKosha