महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1686, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंरेतःशरीरभृत्काये विज्ञाता तु शरीरभृत् ।। ७ ।।
जाननेमें आनेवाला यह सारा जगत् चित्तरूप ही है, वह ज्ञानकी अर्थात् प्रकाशककी अपेक्षा रखता है तथा वीर्यजनित शरीर-समुदायमें रहनेवाला शरीरधारी जीव उसको जाननेवाला है ।। ७ ।।
शरीरभृद् गार्हपत्यस्तस्मादन्यः प्रणीयते ।
मनश्चाहवनीयस्तु तस्मिन् प्रक्षिप्यते हविः ।। ८ ।।
वह शरीरका अभिमानी जीव गार्हपत्य अग्नि है। उससे जो दूसरा पावक प्रकट होता है, वह मन है। मन आहवनीय अग्नि है। उसीमें पूर्वोक्त हविष्यकी आहुति दी जाती है ।। ८ ।।
ततो वाचस्पतिर्जज्ञे तं मनः पर्यवेक्षते ।
रूपं भवति वैवर्णं समनुद्रवते मनः ।। ९ ।।
उससे वाचस्पति (वेदवाणी)-का प्राकट्य होता है। उसे मन देखता है। मनके अनन्तर रूपका प्रादुर्भाव होता है, जो नील-पीत आदि वर्णोंसे रहित होता है। वह रूप मनकी ओर दौड़ता है ।। ९ ।।
ब्राह्मण्युवाच
कस्माद् वागभवत् पूर्वं कस्मात् पश्चान्मनोऽभवत् ।
मनसा चिन्तितं वाक्यं यदा समभिपद्यते ।। १० ।।
**ब्राह्मणी बोली—**प्रियतम! किस कारणसे वाक्की उत्पत्ति पहले हुई और क्यों मन पीछे हुआ? जब कि मनसे सोचे-विचारे वचनको ही व्यवहारमें लाया जाता है ।। १० ।।
केन विज्ञानयोगेन मतिश्चित्तं समास्थिता ।
समुन्नीता नाध्यगच्छत् को वै तां प्रतिबाधते ।। ११ ।।
किस विज्ञानके प्रभावसे मति चित्तके आश्रित होती है? वह ऊँचे उठायी जानेपर विषयोंकी ओर क्यों नहीं जाती? कौन उसके मार्गमें बाधा डालता है? ।। ११ ।।
ब्राह्मण उवाच
तामपानः पतिर्भूत्वा तस्मात् प्रेषत्यपानताम् ।
तां गतिं मनसः प्राहुर्मनस्तस्मादपेक्षते ।। १२ ।।
**ब्राह्मणने कहा—**प्रिये! अपान पतिरूप होकर उस मतिको अपानभावकी ओर ले जाता है। वह अपानभावकी प्राप्ति मनकी गति बतायी गयी है, इसलिये मन उसकी अपेक्षा रखता है ।। १२ ।।
प्रश्नं तु वाङ्मनसोर्मां यस्मात् त्वमनुपृच्छसि ।
तस्मात् ते वर्तयिष्यामि तयोरेव समाह्वयम् ।। १३ ।।