महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1696, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मोवाच
यस्मिन् प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे । यस्मिन् प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति स वै श्रेष्ठो गच्छत यत्र कामः ॥ ७ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**प्राणधारियोंके शरीरमें स्थित हुए तुमलोगोंमेंसे जिसका लय हो जानेपर सभी प्राण लीन हो जायँ और जिसके संचरित होनेपर सब-के-सब संचार करने लगें, वही श्रेष्ठ है। अब तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, जाओ ॥ ७ ॥
प्राण उवाच
मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे । मयि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ॥ ८ ॥
**यह सुनकर प्राणवायुने अपान आदिसे कहा—**मेरे लीन होनेपर प्राणियोंके शरीरमें स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे संचरित होनेपर सब-के-सब संचार करने लगते हैं, इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ (फिर तुम्हारा भी लय हो जायगा) ॥ ८ ॥
ब्राह्मण उवाच
प्राणः प्रालीयत ततः पुनश्च प्रचचार ह । समानश्चाप्युदानश्च वचोऽब्रूतां पुनः शुभे ॥ ९ ॥
**ब्राह्मण कहते हैं—**शुभे! यों कहकर प्राणवायु थोड़ी देरके लिये छिप गया और उसके बाद फिर चलने लगा। तब समान और उदानवायु उससे पुनः बोले— ॥ ९ ॥
न त्वं सर्वमिदं व्याप्य तिष्ठसीह यथा वयम् । न त्वं श्रेष्ठो हि नः प्राण अपानो हि वशे तव । प्रचचार पुनः प्राणस्तमपानोऽभ्यभाषत ॥ १० ॥
‘प्राण! जैसे हमलोग इस शरीरमें व्याप्त हैं, उस तरह तुम इस शरीरमें व्याप्त होकर नहीं रहते। इसलिये तुम हमलोगोंसे श्रेष्ठ नहीं हो। केवल अपान तुम्हारे वशमें है [अतः तुम्हारे लय होनेसे हमारी कोई हानि नहीं हो सकती]।’ तब प्राण पुनः पूर्ववत् चलने लगा। तदनन्तर अपान बोला ॥ १० ॥
अपान उवाच
मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति