भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1701, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1701

**नारदजीने कहा—**मुने! संकल्पसे हर्ष उत्पन्न होता है, मनोऽनुकूल शब्दसे, रससे और रूपसे भी हर्षकी उत्पत्ति होती है ॥ ५ ॥ शुक्राच्छोणितसंसृष्टात् पूर्वं प्राणः प्रवर्तते । प्राणेन विकृते शुक्रे ततोऽपानः प्रवर्तते ॥ ६ ॥ रजमें मिले हुए वीर्यसे पहले प्राण आकर उसमें कार्य आरम्भ करता है। उस प्राणसे वीर्यमें विकार उत्पन्न होनेपर फिर अपानकी प्रवृत्ति होती है ॥ ६ ॥ शुक्रात् संजायते चापि रसादपि च जायते । एतद् रूपमुदानस्य हर्षो मिथुनमन्तरा ॥ ७ ॥ शुक्रसे और रससे भी हर्षकी उत्पत्ति होती है, यह हर्ष ही उदानका रूप है। उक्त कारण और कार्यरूप जो मिथुन है, उन दोनोंके बीचमें हर्ष व्याप्त होकर स्थित है ॥ ७ ॥ कामात् संजायते शुक्रं शुक्रात् संजायते रजः । समानव्यानजनिते सामान्ये शुक्रशोणिते ॥ ८ ॥ प्रवृत्तिके मूलभूत कामसे वीर्य उत्पन्न होता है। उससे रजकी उत्पत्ति होती है। ये दोनों वीर्य और रज समान और व्यानसे उत्पन्न होते हैं। इसलिये सामान्य कहलाते हैं ॥ ८ ॥ प्राणापानाविदं द्वन्द्वमवाक् चोर्ध्वं च गच्छतः । व्यानः समानश्चैवोभौ तिर्यग् द्वन्द्वत्वमुच्यते ॥ ९ ॥ प्राण और अपान—ये दोनों भी द्वन्द्व हैं। ये नीचे और ऊपरको जाते हैं। व्यान और समान—ये दोनों मध्यगामी द्वन्द्व कहे जाते हैं ॥ ९ ॥ अग्निर्वै देवताः सर्वा इति देवस्य शासनम् । संजायते ब्राह्मणस्य ज्ञानं बुद्धिसमन्वितम् ॥ १० ॥ अग्नि अर्थात् परमात्मा ही सम्पूर्ण देवता हैं। यह वेद उन परमेश्वरकी आज्ञारूप है। उस वेदसे ही ब्राह्मणमें बुद्धियुक्त ज्ञान उत्पन्न होता है ॥ १० ॥ तस्य धूमस्तमो रूपं रजो भस्मसु तेजसः । सर्वं संजायते तस्य यत्र प्रक्षिप्यते हविः ॥ ११ ॥ उस अग्निका धुआँ तमोमय और भस्म रजोमय है। जिसके निमित्त हविष्यकी आहुति दी जाती है, उस अग्निसे (प्रकाशस्वरूप परमेश्वरसे) यह सारा जगत् उत्पन्न होता है ॥ ११ ॥ सत्त्वात् समानो व्यानश्च इति यज्ञविदो विदुः । प्राणापानावाज्यभागौ तयोर्मध्ये हुताशनः ॥ १२ ॥ एतद् रूपमुदानस्य परमं ब्राह्मणा विदुः । निर्द्वन्द्वमिति यत् त्वेतत् तन्मे निगदतः शृणु ॥ १३ ॥ यज्ञवेत्ता पुरुष यह जानते हैं कि सत्त्वगुणसे समान और व्यानकी उत्पत्ति होती है। प्राण और अपान आज्यभाग नामक दो आहुतियोंके समान हैं। उनके मध्यभागमें अग्निकी

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